भारत भवन में सोमवार से दो दिवसीय भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान शुरू हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने किया। इस दौरान भारतीय भाषा, साहित्य और संस्कृति से जुड़ी 19 पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मंत्री सारंग ने कहा कि मातृभाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं है, बल्कि इससे व्यक्ति के भाव, विचार, संस्कार और संस्कृति जुड़े होते हैं। युवाओं को अपनी भाषा और जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और संस्कृति को समझकर युवा वर्ष 2047 तक विकसित और मजबूत भारत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सारंग ने कहा कि औपनिवेशिक दौर की शिक्षा व्यवस्था के कारण भारतीय ज्ञान परंपरा को नुकसान पहुंचा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने मध्यप्रदेश में हिंदी माध्यम से एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू होने का भी उल्लेख किया।
ये भी पढ़ें-
एमपी: MLA अभय मिश्रा के बयान पर भड़के रीवा सांसद, बोले- यौन विकृति से पीड़ित, स्टेपनी चोरी कर शुरू किया सफर
भाषाओं में सुरक्षित है सांस्कृतिक विरासत
संस्कृति विभाग के अपर मुख्य सचिव शिवशेखर शुक्ला ने कहा कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की यादें देश की अलग-अलग मातृभाषाओं, बोलियों और लिपियों में सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि गणेश चतुर्थी के अवसर पर भाषा, साहित्य और ज्ञान परंपरा से जुड़े इस आयोजन की शुरुआत होना विशेष संयोग है। कार्यक्रम में ‘मातृभाषा से राष्ट्रभाषा : भाषाओं में भारत की आत्मा’ विषय पर चर्चा हुई। बांग्ला के स्नेहाशीष सूर और कश्मीरी भाषा के आसिम मोहिउद्दीन ने विचार रखे। भाषाई पत्रकारिता पर जयदीप कर्णिक, गिरीश उपाध्याय और नारायण व्यास ने चर्चा की।
ये भी पढ़ें-
एमपी: एक IPS, दो जिले और जहरीली शराब कांड... मुरैना के बाद सागर में फिर अनुराग सुजानिया पर क्यों उठ रहे सवाल?
19 पुस्तकों का लोकार्पण
कार्यक्रम में महर्षि पाणिनि, भोजदेव, पतंजलि, भर्तृहरि और सम्राट राजेंद्र चोल पर आधारित पुस्तकों सहित दस गीताओं और भारतीय इतिहास, साहित्य एवं संस्कृति से जुड़ी अन्य पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। शाम को राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कीर्ति काले, स्वयं श्रीवास्तव, दिनेश दिग्गज, शैलेन्द्र मधुर, अज़हर इकबाल और रामायणधर द्विवेदी ने काव्य पाठ किया। भारत भवन में ‘शब्द से चित्र तक’ नाम से चित्रित पांडुलिपियों की प्रदर्शनी भी लगाई गई है। इसमें भारत के साथ तिब्बत, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया की पांडुलिपि परंपराओं को प्रदर्शित किया गया है। कार्यक्रम के पूर्वरंग में उमेश तरकसवार और उनके दल ने विभिन्न भारतीय भाषाओं और लोकबोलियों के गीत प्रस्तुत किए। आयोजन वीर भारत न्यास और संस्कृति संचालनालय के सहयोग से किया जा रहा है। इसमें भारत भवन, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान और मातृभाषा मंच भी सहभागी हैं।