अशासकीय स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों में प्राचार्य बनना अब और भी आसान हो गया है। जुलाई में आचार्य या सह आचार्य के पद पर 15 साल के अनुभव की बाध्यता खत्म करने के बाद योगी सरकार ने अब प्राचार्य बनने के लिए शोध निर्देशन एवं प्रकाशन की अनिवार्यता को भी समाप्त कर दिया है।
राज्य के स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों के प्राचार्य पद के लिए 400 अंकों के अनिवार्य एकेडमिक परफॉर्मेंस इंडेक्स (एपीआई) को भी समाप्त किया है। प्राचार्य पद के लिए 55 फीसदी अंकों के साथ परास्नातकए पीएचडी की उपाधि व उच्च शिक्षा में 15 वर्ष अध्यापक का अनुभव होना चाहिए।
मंगलवार को आयोजित योगी कैबिनेट की बैठक में राज्य विश्वविद्यालयों से संबद्ध स्ववित्त पोषित अशासकीय महाविद्यालयों में प्राचार्य की अर्हताओं में संशोधन को मंजूरी दी।
स्नातक कॉलेज में प्राचार्य को शोध निर्देशन अनुमन्य नहीं है। लेकिन राजकीय विश्वविद्यालयों से संबंद्ध स्ववित्त पोषित अशासकीय महाविद्यालयों में प्राचार्य पद की अर्हता में शोध निर्देशन एवं प्रकाशन की अनिवार्यता के चलते स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों में प्राचार्य के पद रिक्त चल रहे हैं।
महाविद्यालयों में प्राचार्य के पद रिक्त रहने से विश्वविद्यालय उन्हें स्थायी संबद्धता नहीं दे रहे हैं। स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों को प्रति वर्ष विश्वविद्यालयों में स्थायी और अस्थायी संबद्धता के लिए आवेदन करना पड़ता है।
प्रदेश में बड़ी संख्या में स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों की समस्या समाधान के लिए सरकार ने उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 की धारा 50 की उपधारा 6 में संशोधन कर स्ववित्त पोषित महाविद्यालय में प्राचार्य पद की अर्हता में शोध निर्देशन एवं प्रकाशन की अनिवार्यता को समाप्त किया है।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश में गैर अनुदानित और स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों की संख्या 6500 से ज्यादा है। इनमें प्राचार्य के करीब 3500 पद खाली हैं। नई नियमावली से प्रोफेसर की सीधी भर्ती में 400 अंक की एपीआई की आवश्यकता नहीं होगी। सरकार ने निजी कॉलेजों में प्राचार्य की नियुक्ति में भी इसे लागू कर दिया है।