राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे रामशकल गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमए हैं। राबर्ट्सगंज ने इन्हें लगातार तीन बार (1996, 98 और 99) लोकसभा भेजा। इनकी छवि दलितों, आदिवासियों और किसानों के बीच काम करने वाले नेता की है। पिछले दिनों ही एक कार्यकर्ता को छुड़ाने को लेकर पुलिस से उनका विवाद हुआ था।
समीकरण व सरोकार
रामशकल की बैसवार जाति मिर्जापुर, राबर्ट्सगंज और चंदौली में अनुसूचित जाति और सीमावर्ती छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में पिछड़ी जाति में शामिल है। मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में जल्द विधानसभा चुनाव होने हैं।
भाजपा नेतृत्व ने मिशन 2019 के तहत शुरू हो रहे मोदी के पूर्वांचल दौरे के साथ रामशकल को राज्यसभा सदस्य मनोनीत कर यूपी के साथ मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के भी सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश की है।
मार्च में बलिया के सकलदीप राजभर और अब राबर्ट्सगंज के रामशकल को राज्यसभा सदस्य बनाकर भाजपा ने न सिर्फ पूर्वांचल का जातीय वोट गणित दुरुस्त करने की कोशिश की है, बल्कि सियासी चुनौतियों से निपटने की तैयारी का संकेत भी दे दिया है।
पूर्वांचल के कई जिलों में राजभरों की आबादी अच्छी संख्या में है। पहले सकलदीप और अब रामशकल के जरिये भाजपा ने पूर्वांचल की दलित और पिछड़ी जातियों को लामबंद करने के साथ ओमप्रकाश राजभर के किसी अप्रत्याशित फैसले से पैदा होने वाली स्थिति से भी निपटने की तैयारी कर ली है।
इसमें अगर अप्रैल में विधान परिषद सदस्य बनाए गए पूर्वांचल के दलितों के नाम शामिल कर लें तो भाजपा के चुनावी समीकरणों की काफी हद तक झलक मिल जाती है।