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दलितों के दिल में कौन और उन्हें रिझाने के लिए दलों की क्या तैयारी... डालें नजर

Wed, 11 Jan 2017 06:08 PM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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डेमो ‌प‌िक - फोटो : demo pic
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सूबे की सियासत में सत्ता का गणित दलितों के दिल से ही होकर गुजरता है। प्रदेश की आबादी में 21 फीसदी दलित वोटर समय के हिसाब से लोगों को आजमाता और जिताता रहा है। उसने कांग्रेस, बसपा और भाजपा सभी को मौका दिया। 
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जहां मन मिला, सपा के साथ भी खड़े होने में नहीं हिचके। 2017 के विधानसभा चुनाव में दलितों को साधने के लिए सभी दल जुटे हुए हैं। पर, उनके दिल में क्या है, वे क्या सोच रहे हैं... उनका मिजाज क्या है... इसे समझना आसान नहीं है।

लखनऊ विश्वविद्यालय में लोक प्रशासन विभाग के प्रोफेसर नंदलाल भारती कहते हैं कि जिस तरह समाजवादी पार्टी में अंतर्कलह की वजह से मुस्लिम खुद को बेचैन महसूस कर रहा है, उसी तरह का हाल दलितों का भी है। 
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वे कहते हैं कि 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा के सत्ता से बाहर होने और 2014 के लोकसभा चुनाव में उसके एक भी सीट न जीतने से दलितों को लग रहा है कि यदि बसपा ने ‘सर्वाइव’ नहीं किया तो फिर पहचान का संकट खड़ा हो जाएगा।

कांग्रेस को द‌िया राज करने का मौका

Congress Leader did abusive comment on PM Narendra Modi in Jaipur
हालांकि, गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर गोपाल प्रसाद कहते हैं कि दलितों ने लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहकर उसे दशकों तक राज करने का मौका दिया है तो बसपा के उत्थान और 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में उसकी आधार भूमिका सबने देखी है। 

2014 के लोकसभा चुनाव में दलितों ने अपने बदलते मिजाज का खुलकर संकेत किया और भाजपा न सिर्फ सूबे की 80 में 71 सीटें अकेले जीतने में सफल रही बल्कि उसने सारी सुरक्षित सीटें भी जीत ली। 

प्रसाद कहते हैं कि विधानसभा चुनाव में दलितों का किसी एक के साथ पूरी तरह ध्रुवीकरण संभव नजर नहीं आ रहा। वह अब किसी के साथ पिछलग्गू बनकर नहीं रहना चाहता। दलित बसपा के साथ जरूर माने जाते हैं, लेकिन बीजेपी ने भी दलित कार्ड खेला है और दलितों के बीच उसके नफा-नुकसान की चर्चा हो रही है। 

हालांकि वे यह भी कहते हैं कि कांग्रेस के  दलित कार्ड का कोई खास फर्क नजर नहीं आ रहा है।

बसपा: सुरक्षित सीटों पर बनाई जीत की रणनीति

प्रेस कांफ्रेंस के दौरान बसपा सुप्रीमो
विरोधी दलों ने सुरक्षित सीटों पर बसपा की नाकामी को उसके प्रति दलितों के मोहभंग के रूप में प्रचारित किया। शायद यही वजह रही कि मायावती ने इस बार चुनावी हार-जीत के समीकरण में सबसे ज्यादा सुरक्षित सीटों पर जीत की रणनीति बनाई। 

इस रणनीति को इस तरह भी समझा जा सकता है। चुनाव की घोषणा के  पहले मायावती ने ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग के अपने सभी प्रमुख पदाधिकारियों को सुरक्षित सीटों पर भाईचारा सम्मेलन करने का फरमान सुनाया। 

इनका काम सुरक्षित सीटों पर अपने-अपने वर्ग के मतदाताओं को बसपा के प्रत्याशियों के पक्ष में लामबंद करना था। राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा से लेकर, मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी और पिछड़ा वर्ग के नेता प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर तक इसी मिशन में लगे रहे। 

अब मायावती ने सुरक्षित 86 सीटों की जगह एक जनरल सीटों सहित 87 उम्मीदवारों को मौका देकर उनके प्रति ज्यादा हमदर्दी का संदेश भी देने की कोशिश की है।

भाजपा : अंबेडकर की याद में संविधान दिवस, समरसता भोज से दिया संदेश

BJP LOGO
भाजपा ने केंद्र की सत्ता में आने के बाद दलितों का समर्थन पाने के लिए सरकार और संगठन दोनों स्तर पर कई पहल की। प्रधानमंत्री मोदी पिछले साल लखनऊ में डॉ. अंबेडकर महासभा मुख्यालय का भ्रमण कर चुके हैं। 

पिछले साल मोदी ने स्टैंड-अप इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत यूपी के नोएडा से की। इस योजना में ढाई लाख दलितों को उद्यमी बनाने का एलान किया गया। दलितों के बीच समरसता भोज का आयोजन किया, जिसमें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सहित पार्टी के तमाम नेता अलग-अलग स्थानों पर शामिल हुए। 

मोदी ने लंदन में डॉ. अंबेडकर भवन स्मारक का उद्घाटन किया तो डॉ. अंबेडकर की जयंती को हर साल संविधान दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। डॉ. अंबेडकर पर डाक टिकट भी जारी किया। मोदी ने मुंबई में डॉ. अंबेडकर की याद में इंदु मिल में मनाए जाने वाले स्मारक का शिलान्यास किया। 

दलित वर्ग के नेता और मंत्री प्रदेश में दलितों को जोड़ने के लिए लगातार जुटे हुए हैं। बसपा के कई दलित नेताओं को पार्टी में शामिल भी किया गया है। इनमें पूर्व जोनल कोआर्डिनेटर जुगुल किशोर, पूर्व मंत्री रहे दीनानाथ भास्कर सहित कई चेहरे शामिल हैं।

कांग्रेस : दलित स्वाभिमान यात्रा निकाली, कई वादे किए

congress rally
दलित कांग्रेस के पुराने वोटर माने जाते रहे हैं, लेकिन बीते ढाई दशक में कांग्रेस कभी भी दलितों का मन नहीं जीत पाई। वह 10 साल तक केंद्र की सत्ता में रहने के बावजूद बड़े समर्थन के लिए तरसती रही। 

इस विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस फिर दलितों को साधने की कोशिश में जुटी हुई है। इसके लिए दलित स्वाभिमान यात्रा निकाली। यह यात्रा दलितों के प्रति आठ वचन- केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा और फीस की संपूर्ण प्रतिपूर्ति,  प्रत्येक दलित छात्र को दसवीं कक्षा के बाद उच्च शिक्षा में हॉस्टल व्यवस्था के लिए प्रतिमाह 1000 रुपये छात्रवृत्ति, 

दलित छात्रों के लिए जवाहर नवोदय विद्यालय की तरह प्रति ब्लाक एक आवासीय विद्यालय की स्थापना, दलितों की मदद के  लिए थानों में ‘सुरक्षा मित्र’, विकास में हिस्सेदारी दिलाने के लिए ब्लाकों में ‘विकास मित्र’, और प्राइवेट अस्पताल में इलाज के लिए ‘अंबेडकर आरोग्य श्री’ के अलावा आवास के लिए बिना गारंटी तीन लाख रुपये तक ऋण दिलाने का वादा किया है। 

इसे मिले समर्थन का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस ने कहा था कि वह यात्रा के समापन पर राजधानी में बड़ी रैली करेगी। पर, यह सामान्य कार्यक्रम तक सीमित रही।
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सपा : परिनिर्वाण दिवस की छुट्टी बहाल कर सांकेतिक पहल

समाजवादी पार्टी - फोटो : अमर उजाला
सपा की रीति-नीति से कभी नहीं झलका कि दलित उसके टारगेट ग्रुप में हैं। 

शायद यही वजह रही कि सपा सरकार ने सत्ता में आते ही बसपा संस्थापक कांशीराम की जन्म व पुण्यतिथि के अलावा डॉ. अंबेडकर परिनिर्वाण दिवस पर होने वाले सार्वजनिक अवकाश रद कर दिए। 

मगर, विधानसभा चुनाव नजदीक आते-आते इस पार्टी का मिजाज भी दलितों को लेकर बदला। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने न सिर्फ डॉ. अंबेडकर परिनिर्वाण दिवस की छुट्टी बहाल की बल्कि सीजी सिटी में डॉ. अंबेडकर स्मारक भी बनवाने का वादा किया।  फैक्ट 2012 का विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा दलित सीटों पर भी अपना प्रभुत्व नहीं दिखा सकी।
15 सीटें ही जीत पाई विधानसभा चुनाव में, सुरक्षित सीटें 85 थीं
एक भी सीट पर कब्जा नहीं जमा पाई लोकसभा चुनाव में सुरक्षित सीटों पर
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