राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के संगठनों में दलितों-पिछड़ों को जोड़ने की छटपटाहट बढ़ती जा रही है। भाजपा तो राजनीतिक दल ही है। इसलिए उसकी तरफ से तो वोटों की गणित दुरुस्त करने के लिए इनको जोड़ने के लिए अलग काम चल ही रहा है।
पर, विश्व हिंदू परिषद सहित कुछ अन्य संगठनों ने भी दलितों-पिछड़ों को जोड़ने के कार्यक्रम तय किए हैं। विहिप ने नारा ही दे दिया है, ‘एक हो कुआं, मंदिर व श्मशान, हिंदुओं की हो यह पहचान।’ इसी के साथ पूरे देश में डॉ. अंबेडकर सहित दलित व पिछड़े वर्ग के अन्य महापुरुषों के सम्मान में कार्यक्रम करने का भी फैसला किया गया है।
गठित होंगे ‘हिंदू परिवार मित्र’ समूह: विहिप ने संघ के साथ मिलकर पूरे देश में हिंदुओं का समूह बनाने की योजना बनाई है। इनका नाम ‘हिंदू परिवार मित्र’ दिया गया है।
विहिप के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा बताते हैं कि संघ के शीर्ष नेतृत्व व विहिप के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रवीण भाई तोगड़िया के इस अभियान का मकसद सभी हिंदुओं को एकजुट करना है ताकि सभी जाति के हिंदू एक साथ भोजन करें, रोजमर्रा की जिंदगी में एक-दूसरे के सुखदुख में भागीदार बने। जिससे देश छुआछूत मुक्त बन सके।
शर्मा ने बताया कि अगले वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तक पूरे देश में कम से कम एक लाख ‘हिंदू परिवार मित्र’ समूह गठित करने का लक्ष्य रखा गया है।
समूह के जरिये ये होंगे काम
यह समूह हिंदुओं के बीच छुआछूत को खत्म करने के लिए काम करेंगे। कोशिश करेंगे कि गांव में हिंदू समाज की किसी जाति की किसी मंदिर में जाने पर, किसी कुआं या नल से पानी लेने पर रोक न हो।
महीने में कम से कम एक बार यह समूह अपने-अपने स्थानों पर सामूहिक भोज का आयोजन करे, जिसमें हिंदू समाज के सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ बैठकर भोजन करें। गांवों में भी हिंदुओं का एक श्मशान हो। जिस पर सभी जातियों के लोगों का अंतिम संस्कार हो।
यह भी जुटे: इन संगठनों के अलावा संघ से जुड़े सामाजिक समरसता मंच, सेवा विभाग, मठ-मंदिर विभाग भी अलग-अलग तरीके से दलितों व पिछड़ों को जोड़ने की कवायद में जुटे हैं। मठ मंदिर विभाग के प्रदेश संयोजक वेद प्रकाश सचान बताते हैं कि छुआछूत मुक्त हिंदू समाज बनाने के लिए आचार्यों की मदद से समरसता यज्ञों की योजना बनाई गई है।
इसके तहत संगठन के लोग गांवों में सभी को बुलाकर हवन-पूजन कराएंगे। संघ से जुड़ी पत्रिका पांचजन्य ने भी डॉ. अंबेडकर पर विशेषांक निकाला है। कुछ अन्य संगठन भी अलग-अलग साहित्य तैयार कराकर बांट रहे हैं।
कहीं यह वजह तो नहीं
पिछले वर्ष यहां हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की केंद्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक में दलित व पिछड़ी जातियों के बीच संघ की पकड़ व पहुंच कमजोर होने पर चिंता जताई गई थी।
यह भी स्वीकार किया गया था कि इन जातियों में पकड़ व पहुंच बढ़ाए बगैर संगठन की पकड़ व पहुंच मजबूत नहीं रहने वाली। माना जाता है कि उसी के चलते संघ परिवार के संगठनों ने अलग-अलग तरीके से दलितों व पिछड़ों को जोड़ने की योजना बनाई है।
वहीं कुछ का यह भी कहना है कि भले ही संघ अपने फैसलों के पीछे कोई राजनीतिक वजह न होने का तर्क देता हो लेकिन इस कवायद के पीछे कहीं न कहीं 2017 के चुनाव की भी गणित है।
संघ परिवार के रणनीतिकार जानते हैं कि भले ही फैसलों को राजनीतिक लाभ-हानि से परे बताते हों लेकिन उनकी हर कवायद का लाभ अंतत: परिवार में शामिल भाजपा को ही मिलने वाला है।