अपने बजट में गांव और किसानों के विकास की बात करने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पोल खुल गई है। प्रदेश के 39 जिले सूखे के मुहाने पर खड़े हैं। 50 से ज्यादा जिलों में सामान्य से बेहद कम बरसात ने किसानों का चैन छीन रखा है।
कृषि विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि 25 जुलाई तक ऐसे ही हाल रहे तो ऐसे जिलों की तादाद बढ़ भी सकती है। पर, मजेदार बात ये है कि ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) जैसी तकनीक के जमाने में भी सूखे से फसलों को होने वाले नुकसान का आकलन तुक्के पर होता है।
लेखपालों के पास ऐसा कोई तकनीकी संसाधन नहीं हैं जिससे वास्तविक नुकसान का सटीक आकलन कर सकें। आकलन का वैज्ञानिक आधार नहीं होने के कारण ही नुकसान के आकलन पर सवाल उठते हैं, वहीं सरकार की लापरवाही को भी दर्शाते हैं, वो भी उस सरकार की जो कि गांव और किसानों के विकास का वादा करती है।
लेखपालों की कमी भी है एक समस्या
राजस्व विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि सूखे की पहली सूचना लेखपाल से ही आती है। वही बताता है कि उसके क्षेत्र में बरसात न होने से फसलें सूख रही हैं। इसके बाद जिलाधिकारी उसके जरिये यह पता लगवाते हैं कि कौन सी फसलें कितने क्षेत्रफल में बोई गईं और उसमें कितना नुकसान हुआ।
आमतौर पर 50 फीसदी नुकसान पर सूखा घोषित हो सकता है। डीएम जो रिपोर्ट शासन को भेजता है उस पर तय होता है कि सूखे लायक हालात हैं या नहीं। यानी एक बेहद लंबी प्रक्रिया। लेखपालों की कमी इसे और भी मुश्किल बना देती है।
ऐसे हो सकता है वास्तविक आकलन
जानकारों के मुताबिक जीपीएस बेस्ड तकनीक का इस्तेमाल किया जाए तो न केवल सटीक आकलन किया जा सकता है बल्कि रिपोर्ट तैयार करने में लगने वाले समय को भी बचाया जा सकता है। ऐसे तकनीकी मौजूद है।
जीपीएस की मदद से फसल के नुकसान वाले इलाके का नक्शा बनाकर वास्तविक आकलन किया जा सकता है। इससे सूखा की वास्तविक स्थिति को लेकर लगने वाले आरोप-प्रत्यारोप भी नहीं होंगे। अभी नुकसान की रिपोर्ट लगवाने के लिए लेखपालों को तरह-तरह के दबाव का सामना करना पड़ता है।
बोवाई नहीं कर पाए तो नुकसान नहीं
बारिश न होने से बुंदेलखंड के बड़े हिस्से में बोवाई नहीं हो पाई है। पर, लेखपाल बताते हैं कि मौजूदा व्यवस्था के अनुसार वे बोई गई फसलों के नुकसान का ही आकलन करते हैं। अगर फसल बोई ही नहीं गई तो फिर नुकसान कैसा?
सूखा बताने वाले लेखपालों के 8000 पद खाली
सूखा हो या बाढ़ किसानों के नुकसान का आकलन राजस्व विभाग अपने लेखपाल से कराता है। मगर प्रदेश में राजस्व विभाग की रीढ़ माने जाने वाले लेखपालों के 8000 पद अर्से से खाली हैं।
इस विभाग में 27,234 पद सृजित हैं। तस्वीर साफ है कि हर लेखपाल केपास औसतन दो से तीन क्षेत्रों का प्रभार है।
ऐसे में वह अपना काम कितनी जिम्मेदारी से कर पाता है, इसका अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। इसी तरह नायब तहसीलदार के 650 व राजस्व निरीक्षक के करीब 800 पद खाली हैं।
हर जिले के पास 25-25 लाख एडवांस
राजस्व विभाग के एक अफसर के मुताबिक चालू वित्तीय वर्ष में दैवी आपदा में प्रभावित लोगों को तत्काल राहत पहुंचाने के लिए हर जिले को एडवांस में 25-25 लाख रुपये उपलब्ध कराए गए हैं।
इसके लिए एकमुश्त 18.75 करोड़ की रकम काफी पहले जारी की जा चुकी है। आपदा राहत मद से उपलब्ध कराई गई इस रकम का उपयोग डीएम सूखा के दौरान तत्काल राहत सहायता उपलब्ध कराने में भी कर सकेंगे।
सूखा के मद्देनजर जिलों को अहम निर्देश
-हर ब्लॉक में 50-50 हैंडपंप रिबोर किए जाएं।
-तहसील स्तर पर वर्षा मापकयंत्र के माध्यम से बरसात की क्लोज मॉनिटरिंग की जाए।
-मनरेगा मजदूरों का बकाया भुगतान कराया जाए।
-सूखे की स्थिति में विकास खंड एवं न्याय पंचायत स्तर पर कार्यरत कर्मचारी व अधिकारी आपात योजना की जानकारी किसानों तक पहुंचाएं।
ये भी दिए गए निर्देश
-सूखे की स्थिति में किसान उसी फसल को बोएं जिसमें कम पानी लगता हो।
-पशुओं के लिए चारे का पर्याप्त भंडारण की व्यवस्था हो।
-तालाबों व पोखरों में पशुओं के पानी और गरीबों के लिए पर्याप्त अनाज की व्यवस्था हो।
-मनुष्यों व पशुओं की बीमारियों से निपटने के लिए दवाई का प्रबंध करें।
-केंद्र सरकार से मनरेगा योजना के अंतर्गत जरूरी धन की मांग अभी से कर लें।
-शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत-आपूर्ति रोस्टर के अनुसार की जाए। खराब ट्रांसफार्मर तत्काल बदले जाएं।
-ट्यूबवेल चलाने में बिजली का संकट नहीं आना चाहिए।
मामले पर लेखपाल संघ के अध्यक्ष का कहना है कि अभी तो बोवाई व रोपाई हो रही है। गन्ना को छोड़कर बाकी फसलों को खास नुकसान नहीं हुआ है। बोवाई देर से जरूर शुरू हुई है। अगर 25 जुलाई तक बरसात नहीं होती है और हालात ऐसे ही बने रहते हैं तो फिर सूखे के मद्देनजर रिपोर्ट देनी शुरू की जाएगी। या इसके पहले शासन से कोई निर्देश मिलता है तो उसके हिसाब से कार्यवाही की जाएगी।