स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना महामारी की पहली लहर का सामना करने के बाद पहली बार 2021-22 में स्वास्थ्य सेक्टर के लिए कुल बजट का 6.3 प्रतिशत प्रावधान करने का साहस दिखाया। मगर यह भी स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य से काफी कम है।
यही नहीं, इस बढ़े बजट में भी राज्य की प्राथमिकता में कोरोना की दूसरी लहर की चुनौती उभर कर सामने नहीं आई। महामारी को ध्यान में रखकर बेड बढ़ाने, वेंटिलेटर व ऑक्सीजन आदि खरीदने के लिए व्यवस्था का बजट में अभाव रहा। अगर 50 करोड़ के कोरोना टीकाकरण फंड को छोड़ दें तो रुटीन तरीके से ही फोकस रहा। नतीजा हुआ कि कोरोना की दूसरी लहर से विभाग के हाथ-पांव फूल गए।
प्रदेश के कुल बजट का स्वास्थ्य पर खर्च
वित्तीय वर्ष -- बजट प्रस्ताव -- वास्तविक खर्च
2017-18 -- 5.2% -- 5.5%
2018-19 -- 5.5% -- 5.0%
2019-20 -- 5.4% -- 5.6%
2020-21 -- 5.5% -- 5.3% (संशोधित अनुमान)
2021-22 -- 6.3% -- बजट अनुमान
अर्थशास्त्री प्रो. रोली मिश्रा कहती हैं कि सरकार विशेषज्ञों व मार्गदर्शी संस्थाओं के सुझाव तथा नीतियों पर चलने की जगह आग लगने के बाद कुंआ खोदने की नीति पर चल रही है। न सिर्फ सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की अनुसंशाओं को नजरअंदाज किया बल्कि अपने स्तर से जो बजटीय आवंटन किया, उसका भी लाभ लोगों को मिलता नजर नहीं आ रहा है।
कोविड-19 की दूसरी लहर की चेतावनी पिछले छह महीने से विशेषज्ञ दे रहे थे। यह भी कहा जा रहा था कि इसका असर ज्यादा घातक होगा। पर, सरकार चुप बैठी रही। अतिरिक्त बेड, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन की आवश्यकता पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। जब महामारी आ गई, लोग जान गंवाने लगे, हाहाकार मच गया, तब सरकार सक्रिय हुई।
सरकार ने समय से नीतियों का क्रियान्वयन किया होता व विशेषज्ञों की सुनी होती तो इस हाहाकार की नौबत न आती। सरकार को इस विफलता से सीख कर भविष्य के लिए स्वास्थ्य सेक्टर में काम करने की जरूरत है।