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बेहद अहम है यूपी चुनाव का छठा चरण, सभी को उम्मीदें तो चुनौतियां भी कम नहीं

Thu, 02 Mar 2017 02:03 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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पूर्वांचल में प्रभाव रखने वाले आदित्यनाथ व मुलायम सिंह - फोटो : amar ujala
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छठे चरण की जंग वाली जमीन से सभी दलों को उम्मीदें हैं तो हर एक के सामने कुछ न कुछ चुनौतियां भी हैं। विधानसभा के पिछले चुनाव में भाजपा को इस जमीन की 49 सीटों में सिर्फ सात तो सपा को 27 सीटें मिली थीं।
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वर्ष 2007 में परिसीमन से पहले इस जमीन वाली सीटों में बसपा को 25 पर जीत मिली थी। भाजपा की बात करें तो उसके लिए इस जमीन पर कुछ ज्यादा चुनौती नजर आती है, क्योंकि कई इलाके तो ऐसे हैं जिन पर पिछले चुनाव में ही नहीं उसके पहले हुए छह चुनावों में भी उसका खाता नहीं खुल सका है।

हालांकि कुछ सीटें ऐसी भी हैं जिन पर भाजपा को बीते सात चुनाव में तीन से छह बार तक सफलता मिल चुकी है। अखिलेश वाजपेयी की रिपोर्ट-

सपा व बसपा सहित सभी ने की ध्रुवीकरण की कोशिश

मुलायम सिंह यादव व मायावती - फोटो : amar ujala
छठे चरण में होने वाले चुनाव के इलाके में भगवा टोली के खास चेहरे और पूर्वांचल में सियासी ध्रुवीकरण के प्रतीक महंत आदित्यनाथ हैं, तो वह आजमगढ़ भी है जो लोकसभा चुनाव के दौरान मुद्दा बना था।

सपा की तरफ से ही नहीं बल्कि बसपा ने भी दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर को मुद्दा बनाकर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की थी। कांग्रेस के साथ भाजपा को भी  निशाना बनाया था। जवाब में भाजपा ने भी आतंकी कनेक्शन को मुद्दा बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी।

इस चुनाव  में भले ही आतंकी कनेक्शन की चर्चा बहुत ज्यादा न सुनाई दे रही हो, लेकिन आदित्यनाथ सहित भाजपा के कई नेता बीच-बीच में इस मामले को धार देते रहे हैं। यहां यह बात भी गौर करने वाली है कि आजमगढ़ सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव की संसदीय सीट है तो बगल का मऊ मुख्तार जैसे चेहरे के प्रभाव वाला इलाका है।

अब तक यही माना जाता रहा है कि इस इलाके में मुख्तार की सियासी हैसियत बनाने के पीछे भी वोटों का ध्रुवीकरण ही बड़ी वजह रही है तो मोदी लहर में आजमगढ़ में मुलायम की जीत के पीछे भी यादव व मुस्लिम वोटों की गोलबंदी ही बड़ा कारण रहा है।

लगातार हो रही मुस्लिमों को लामबंद करने की कोशिश

- फोटो : अमर उजाला
इस इलाके के समीकरण ही हैं कि सपा और बसपा की तरफ से अपने वोट बैंक के साथ मुस्लिम वोटों की गोलबंदी की कोशिश की जा रही है।

बसपा मुखिया मायावती अलग पूर्वांचल राज्य के मुद्दे को धार देने के साथ मुसलमानों को यह समझाने की कोशिश करती घूम रही हैं कि सपा व कांग्रेस गठबंधन को वोट देने का मतलब भाजपा की जीत होगी।

वह भाजपा की सरकार बनने पर आरक्षण खत्म होने का दावा कर रही हैं तो यह भी बताती घूम रही हैं कि मुसलमानों के साथ सपा, कांग्रेस और भाजपा सौतेला व्यवहार करती हैं। सपा की तरफ से भी अल्पसंख्यकों के कल्याण के कामों को गिनाकर वोटरों की लामबंदी का प्रयास किया जा रहा है।

भाजपा को मिल रहा जवाबी गोलबंदी का मुद्दा

आजम खां कहते घूम रहे हैं कि सपा की सरकार बनने पर ही मुसलमानों का उत्थान हो सकता है। भाजपा को भी इससे जवाबी गोलबंदी के लिए मुद्दे मिल रहे हैं।

इसीलिए केंद्र सरकार की तरफ से किए जाने वाले कामों के साथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह व प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य सरकार बनने पर यांत्रिक कत्लखाने बंद करने के वादे के साथ यह बताते भी घूम रहे हैं कि केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद पाकिस्तान की गोलियों का जवाब गोलों से दिया जा रहा है।

महंत आदित्यनाथ तो काफी पहले से इस इलाके में यह बात कहते घूमते रहे हैं कि प्रदेश सरकार आतंकियों पर मुकदमे उठाने की कोशिश कर रही है।

गोरखपुर में भाजपा की जीत तो आजमगढ़ में एक सीट नहीं

महंत आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
भाजपा के लिए उम्मीदों की बात करें तो गोरखपुर शहर जैसी सीट पर पार्टी पिछले सात चुनाव में छह बार जीत चुकी है। एक बार हिंदू महासभा विजयी रही। इसी तरह महराजगंज में चार, हाटा में चार, सिसवा, बांसगांव व रामकोला तीन-तीन जीत हासिल हो चुकी है।

इसके अलावा कई सीटों पर भाजपा दो बार जीत चुकी है। पर, आजमगढ़ जैसे जिले भी हैं जहां की निजामाबाद, अतरौलिया, फूलपुर, गोलापुर, सगड़ी, मुबारकपुर, गोरखपुर की चिल्लूपार, मऊ सदर, बलिया की सिकंदरपुर, बांसडीह जैसी सीटें भी हैं जिन पर भाजपा का अभी तक खाता भी नहीं खुल सका है।

हालांकि इनमें से कई सीटों पर लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा को बढ़त मिली थी। इसलिए यह सीटें भाजपा के लिए चुनौती के साथ उम्मीदों वाली भी हैं क्योंकि इन सीटों की गणित को हल करने के लिए ही भाजपा ने अपना दल और भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन भी किया है।

सपा के सामने 2012 का प्रदर्शन दोहराने की चुनौती है तो बसपा के सामने 2007 के आंकड़ों को छूने का लक्ष्य है। कारण यह है कि कई सीटें ऐसी हैं जिन पर पिछले पांच चुनाव में सपा और बसपा के बीच ही मुकाबला होता रहा है।
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जातीय गणित भी है एक वजह

- दरअसल, इस इलाके से हर दल को उम्मीदों की खास वजह इलाके की जातीय गणित है। गोरखपुर, कुशीनगर, आजमगढ़ की कई सीटों पर 50 से 70 हजार तक के यादव मतदाता हैं तो कई जगह लगभग इतनी ही संख्या में ठाकुर बिरादरी के मतदाता हैं।

- गोरखपुर, आजमगढ़ व मऊ शहरों में वैश्य बिरादरी के मतदाताओं की बड़ी तादाद है। खजनी, चिल्लूपार, कुशीनगर के तमुकही राज और रामकोला जैसे क्षेत्र में ब्राह्मण मतदाता प्रभावी संख्या में मौजूद हैं।

- आजमगढ़, देवरिया, मऊ, कुशीनगर की कई सीटों पर मुस्लिम मतदाता 60 हजार से एक लाख तक हैं। बलिया, महाराजगंज की कई सीटें अति पिछड़ी जातियों की बहुलता वाली हैं जिनमें राजभर, बिंद, कुम्हार, मौर्य, कुशवाहा, मल्लाह, केवट, कश्यप, नोनिया, जैसी जातियां कई जगह निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नजर आती हैं। यह जातीय गणित अलग-अलग दलों के अलग-अलग तरीके से माकूल बैठता हैं।

- सपा के लिए यादवों व मुस्लिमों के ध्रुवीकरण से उम्मीदें बंधती है तो भाजपा के लिए अगड़ों के साथ अति पिछड़ों के समीकरण फिट बैठते हैं। बसपा के लिए अगड़ों के साथ जाटव व अन्य दलित जातियों का गठजोड़ मुस्लिम वोटों की लामबंदी के लिए आधार बनाता है।
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