नौवीं और दसवीं में लागू सतत मूल्यांकन के तहत नंबर देने में कॉलेजों की मनमानी नहीं चलेगी।
इसके लिए निर्धारित 30 अंकों में से 15 अंक अब बोर्ड द्वारा नियुक्त परीक्षक देंगे।
कॉलेज के हाथों में सिर्फ 15 नंबर होंगे। अभी तक सतत मूल्यांकन के लिए निर्धारित 30 अंक देने का अधिकार कॉलेज के हाथों में था।
यूपी बोर्ड ने इस संबंध में निर्णय ले लिया है। नई मूल्यांकन व्यवस्था इसी सत्र से लागू हो जाएगी। इस समय लागू व्यवस्था के तहत यूपी बोर्ड ने हाईस्कूल स्तर पर हर विषय की परीक्षा को दो भागों में बांटा है।
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100 नंबर के प्रश्नपत्र के पहले भाग में 70 नंबरों का निर्धारण वार्षिक लिखित परीक्षा के आधार पर किया जाता है।
जबकि बाकी बचे 30 नंबरों का निर्धारण प्रैक्टिकल व प्रोजेक्ट के साथ ही अभ्यर्थी की उपस्थिति और कक्षा में उसकी गतिविधि के आधार पर किया जाता है।
इस प्रक्रिया को सतत मूल्यांकन का नाम दिया गया है। सतत मूल्यांकन के अंतर्गत अगस्त, अक्तूबर और दिसंबर में अभ्यर्थियों का टेस्ट और प्रैक्टिक्ल होता है।
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हर टेस्ट 10-10 नंबर का होता है। ये नंबर बोर्ड परीक्षा में भी जुड़ते हैं। इस वजह से देखा गया है कि कॉलेज नंबर देने में मनमानी करते हैं।
शिक्षक संघ सतत मूल्यांकन में शिक्षा माफिया के सक्रिय होने व प्रैक्टिकल के नंबर के लिए स्टूडेंट्स से बाकायदा वसूली करने के आरोप लगाते रहे हैं।
इन शिकायतों का संज्ञान लेते हुए माध्यमिक शिक्षा परिषद ने आंतरिक मूल्यांकन के लिए नया विकल्प निकाला है।
अब 30 अंकों की बजाय केवल 15 नंबर ही कॉलेजों के हाथ में होंगे। बोर्ड बाकी 15 नंबर देने के लिए परीक्षकों की नियुक्ति करेगा।
अगर कॉलेज और परीक्षक द्वारा दिए गए नंबरों में ज्यादा अंतर होगा तो फिर कॉलेज की पोल खुल जाएगी। यह व्यवस्था इसी साल से बोर्ड परीक्षाओं में लागू की जाएगी।
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