एक विभाग में प्रमुख सचिव स्तर के दो अधिकारी हैं। पिछले दिनों एक उच्चस्तरीय बैठक हुई।
उसके लिए दोनों ने ही अच्छी-खासी तैयारी की थी। पहले प्रमुख सचिव तो अपनी बेहतर इमेज के लिए जाने ही जाते हैं, दूसरे की भी छवि तेजतर्रार और ईमानदार अफसर की है।
जिस विभाग में रहे, उनके तेवर हमेशा चर्चा में रहे। ट्रांसफर मंजूर किया, छवि से समझौता नहीं किया। इधर काफी तेजी से वह पहले वाले प्रमुख सचिव का विकल्प बन कर उभर रहे थे।
चर्चा तेज थी कि बड़े साहब बजट सत्र बाद दूसरे विभाग में जाएंगे तो दूसरे साहब ही मौका पाएंगे। मगर इस उच्चस्तरीय बैठक में दूसरे वाले साहब की कुर्सी ही गायब हो गई।
लोगों को यह अजीब लगा। अब ये कयास भी तेज हो गया है कि छोटे वाले कितने दिन मौजूदा विभाग में रह पाते हैं।
वजह, बड़े साहब सारे अच्छे गुणों के बावजूद चुपचाप रास्ते के रोड़े को हटाने के लिए भी जाने जाते हैं।