लखनऊ में आपका बचपन कैसा बीता था?
हमारे घर में बच्चे ज्यादा जिंदा नहीं रहते थे तो हम बचपन में बेच दिए गए थे बेगम साहिबा को, उन्होंने मेरा नाम फकीरे रख दिया था। मेरे बड़े भाई का नाम गुलाम हुसैन रखा। हम मोहर्रम में ताजिया रखते थे। हम बचपन में ताबीज पहनकर फकीरी करते थे, लोगों के यहां जाकर मांगना होता था। बेगम हमें खाने को चीजें दिया करती थीं।
अक्षय कुमार को चौंका दिया था
पंछी जा, पंछी आ एक नाटक होता था। वो शायद मेरे जीवन का सबसे बेहतरीन हास्य नाटक था। उसी नाटक पर बाद में फिल्म बनी गरम मसाला। मैंने अक्षय कुमार से कहा कि आप आज जो रोल कर रहे हैं, यह मैं किसी जमाने में कर चुका हूं। तब वो चौंके कि मैंने कहां ये रोल किया। मैंने उनसे कहा- ‘मैं भी कभी जवान था’।
इश्कजादे फिल्म के ऑडिशन में क्या हुआ था?
ऑडिशन में जो लाइनें मुझे दी गईं, उनमें से एक लाइन मेरी समझ में नहीं आ रही थी। तब मैंने अपने साथी कलाकार अशोक सिन्हा से पूछा कि यह लाइन समझ नहीं आ रही। उन्होंने बताया कि यह लाइन कैसे करनी है जबकि वे खुद भी ऑडिशन के लिए आए थे। सोचिए जिन्होंने मुझे लाइन बताई उन्हीं का चयन नहीं हुआ और मुझे वो रोल मिल गया था, शायद उसी लाइन की वजह से। और उसी फिल्म की वजह से मेरे फिल्मी कॅरिअर में बड़ा बदलाव आया।
डॉ. अनिल रस्तोगी, रंगमंच कर्मी
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पद्मश्री पाने की घोषणा से क्या कुछ बदला?
जब पद्मश्री मिलने की घोषणा हुई तो मुझे खुशी तो हुई लेकिन सबसे ज्यादा खुशी यह जानकार हुई कितने सारे लोग मुझे चाहते हैं। घोषणा के तुरंत बाद से ही मुझे फोन आने लगे, मेसेज आने लगे। इस बात ने मुझे बताया कि लोग मुझसे कितनी मोहब्बत करते हैं।
लखनऊ से बाहर जाने पर लखनऊ को किस रूप में देखते हैं?
लखनऊ से होने के कारण मुंबई और अन्य जगहों पर जब भी जाता हूं तो मेरे दोस्त यहां की बिरयानी खूब मंगवाते हैं। मैं तो नॉनवेज खाता नहीं, लहसुन भी नहीं खाता लेकिन लोग हमसे खाना मंगवाना बिल्कुल नहीं भूलते। हमने कभी चिकनकारी का काम भी किया, इसीलिए हमारे घर का नाम भी चिकन महल है।
कभी किसी ने कहा, साइंस और थियेटर में एक चुनो?
एक बार मुझे कहा गया कि कहीं एक जगह फोकस कर लो, तब मैंने कहा कि मैं साइंस के प्रति अपनी ड्यूटी को कभी नहीं छोड़ता। साइंस के लिए अपना पूरा समय देने के बाद ही मैं अपने उस वक्त में थियेटर के लिए वक्त निकालता हूं जब बाकी लोग अपने घरवालों के साथ समय बिताते हैं। उसी थियेटर को दिए वक्त ने आज मुझे सब कुछ दे दिया।
लखनऊ की तवायफें हुआ करती थीं तहजीब का स्कूल
डॉ. अनिल रस्तोगी ने बातचीत के दौरान कहा कि लखनऊ अपनी तहजीब, नजाकत, नफासत और खानपान के लिए मशहूर है। यहां तक कि यहां की तवायफें भी इतनी तहजीबदार हुआ करती थीं कि सामान्य शिष्टाचार का सलीका सीखने के लिए रसूखदारों के परिवारों के बच्चों को उनके पास भेजा जाता था। वह दौर ही अलग था, आज वक्त बहुत बदल गया है। लखनऊ भी तेजी से बदल रहा है।