बलरामपुर अस्पताल के प्लास्टिक सर्जन ने दो सर्जरी के बाद एक बच्चे को नई जिंदगी दी है। आग में बुरी तरह झुलसे बच्चे का बायां हाथ सीने से चिपक गया था जबकि पंजा पूरी तरह मुड़ गया था।
छह महीने पहले बच्चा बलरामपुर अस्पताल पहुंचा तो डॉक्टर उसकी हालत देख दंग रह गए। लंबे प्राथमिक उपचार के बाद 14 अप्रैल को पहली सर्जरी और एक हफ्ते बाद दूसरी सर्जरी कर बच्चे के चिपके हुए हाथ और पंजे को अलग किया गया। सर्जरी के दौरान बुरी तरह चिपके हाथ की धमनियां खराब होने का खतरा था लेकिन अब बच्चा तेजी से रिकवर कर रहा है।
सीतापुर का सुनील (10) भाड़ की आग में झुलस गया था। उसके बाएं हाथ की त्वचा चिपक गईं और हाथ का पंजा पूरी तरह मुड़ गया था।
बलरामपुर अस्पताल के सीएमएस और प्लास्टिक सर्जन डॉ. राजीव लोचन ने बताया कि छह महीने पहले जब सुनील अस्पताल आया तो आग में बुरी तरह जलने की वजह से उसका बायां हाथ सीने में धंस गया था, जबकि पंजा पूरी तरह मुड़कर गोल हो गया था।
पहले कलाई व पंजे को किया सीधा
डॉ. राजीव लोचन
- फोटो : amar ujala
डॉ. लोचन ने बताया कि बच्चे को सबसे पहले प्राथमिक उपचार दिया गया। जख्म भरने के बाद पहली सबसे पहले कलाई और पंजे को सीधा किया गया।
इसके बाद बीते 14 अप्रैल को सीने में धंसे हाथ को दो घंटे की सर्जरी के बाद अलग कर दिया गया। सीने से हाथ को अलग करने के सात दिन बाद उसकी प्लास्टिक सर्जरी की गई जिसमें डेढ़ घंटे का समय लगा।
अब बच्चा पूरी तरह ठीक है और पहले से बेहतर महसूस कर रहा है। डॉ. लोचन ने बताया कि प्लास्टिक सर्जरी के लिए थाई से स्किन ली गई जबकि हाथ की स्किन को भी रिपेयर किया गया जिससे बच्चे के हाथ को ठीक किया जा सके।
धमनियों को नुकसान का था डर
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डॉ. राजीव लोचन ने बताया कि सुनील की सर्जरी इसलिए कठिन थी क्योंकि धमनियां आपस में चिपक गई थीं और सर्जरी के दौरान उनके डैमेज होने का खतरा भी था।
डॉ. लोचन के मुताबिक, सर्जरी के दौरान धमनियों को नुकसान होने पर अधिक रक्तस्राव होने का खतरा था।
धमनियों को बचाने के लिए कई एंगल से सीटी स्कैन और एक्स-रे कराई गई थी जिससे धमनियों की स्थिति को पता किया जा सके और उनको नुकसान से बचाया जा सके।
प्राइवेट में 80 हजार रुपये का खर्च
डॉ. राजीव लोचन के मुताबिक, सुनील की सर्जरी किसी निजी अस्पताल में होती तो 80 हजार रुपये से अधिक खर्च होता।