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सबको आजमाया, वरुण को गले लगाएगा सुल्तानपुर?

Fri, 25 Apr 2014 11:38 AM IST
रमाकांत तिवारी/अमर उजाला, सुल्तानपुर
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सुल्तानपुर का नाम आते ही भगवान राम के पुत्र कुश की धरती याद आती है।
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विजेथुआ का महावीरन धाम, धोपाप घाट की निर्मलता...। एक भव्य तस्वीर जेहन में कौंधती है।

पर तस्वीर का दूसरा पहलू इस भव्यता के पीछे छिपी बदहाली की पोल खोल देता है। गड्ढों से भरी सड़कें, पानी की समस्या से जूझते लोग...।

यहां के लोगों का कहना है कि सभी पार्टियों को आजमाया गया है लेकिन किसी ने भी इस क्षेत्र को गले नहीं लगाया।

देखना होगा यहां से पहली चुनाव लड़ रहे वरुण गांधी क्या-कुछ नया करते हैं।

समस्याएं, जो नहीं बन पातीं चुनावी मुद्दे

जिले के विभाजन के बाद सारे उद्योग-धंधे अमेठी में चले गए। ले-देकर जिले में सहकारी चीनी मिल ही है, जो करीब सवा अरब के घाटे में चल रही है।

कल-कारखानों के अभाव में बेरोजगारी जिले की बड़ी समस्या है। समस्याओं की फेहरिस्त यहीं नहीं रुकती।

बिजली की आंखमिचौली परेशान करती है। लखनऊ-वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग को छोड़ दिया जाए तो सभी सड़कें क्षतिग्रस्त हैं।

संपर्क मार्गों की हालत तो और खराब है। नहरों के सीपेज से धनपतगंज और कुड़वार इलाके की सैकड़ों बीघा भूमि में हमेशा पानी भरा रहता है।

कुछ किसानों की की तो पूरी की पूरी जमीन दलदल में तब्दील हो गई है। गोमती नदी की तराई वाले इलाकों में कुएं का पानी पीने लायक नहीं है।

ज्यादातर इंडिया मार्का हैंडपंप खारा पानी देते हैं, पर यह सब चुनावी मुद्दे नहीं बन पाते।
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सबको दिया मौका

1984 में कांग्रेस के राजकरन सिंह यहां से जीते थे। इसके बाद कांग्रेस 2009 में ही सीट पर कब्जा पा सकी।

इस बीच जनता दल, भाजपा, बसपा ही सीट पर काबिज रहीं। विकास की आस में 2009 में डॉ. संजय सिंह को लोगों ने संसद भेजा। तमाम समस्याओं को उन्होंने संसद में उठाया भी।

शहर में दो फ्लाईओवर और ट्रॉमा सेंटर निर्माणाधीन हैं। शहर की जलापूर्ति व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए 50.72 करोड़ रुपये की कार्ययोजना को मंजूरी दिलाई।

इसके बावजूद वे जनता की उम्मीदों पर पूरी तरह से खरे नहीं उतर सके। क्षेत्र में किसी उद्योग-धंधे की शुरुआत नहीं हो सकी। सड़कों की बदहाली में कोई सुधार नहीं हुआ।

बसपा के काडर वोट के साथ ब्राह्मण मतों के ध्रुवीकरण का भरोसा है। 1999 के लोकसभा चुनाव में बतौर निर्दलीय प्रत्याशी करीब सवा लाख वोट हासिल करना।
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