काकोरी कांड में फरार चंद्रशेखर आजाद की गिरफ्तारी को देश भर में छापेमारी हो रही थी। एक दिन पता चला कि वह देहरादून एक्सप्रेस सेबनारस जा रहे हैं। खुफिया अधिकारी और पुलिसवालों को इसकी भनक लगी तो उन्होंने उन्हे लखनऊ में पकड़ने की तैयारी की। फरवरी 1930 की कड़कड़ाती सर्दी का दिन था।
तेज बरसात भी हो रही थी। आजाद सबकी आंखों में धूल झोंककर चारबाग स्टेशन से बाहर आ गए। पुलिस ने पीछा किया लेकिन आजाद बासमंडी चौराहा से लालकुआं होते हुए हीवेट रोड के पास एक संकरी गली में घुस गए। तीन-चार मकान छोड़कर उन्होंने दाहिनी ओर के एक मकान की कुंडी खटखटाई।
एक वृद्धा ने दरवाजा खोलते हुए पूछा, ‘कौन?’ आजाद बोले, ‘भीग गया हूं। पानी रुकने तक शरण चाहता हूं।’ औरत ने उन्हें अंदर बुला लिया। आजाद ने झट से कुंडी बंद कर दी। फिर भीगे कपड़े बदलने के लिए आजाद को तौलिया और एक धोती लाकर आजाद को दी। धोती जनानी थी। आजाद को हंसी आ गई।
आजाद की जिंदा व मुर्दा गिरफ्तारी पर इनाम किया घोषित
ब्रिटिश सरकार में खुफिया विभाग में काम करने वाले धर्मेंद्र गौड़ ने लिखा है, ‘बूढ़ी औरत बोली, ‘बेटा घर में कोई मर्द तो है नहीं। मैं और एक बेटी ही है। तुम्हारा नाम क्या है?’ आजाद ने जवाब दिया, ‘झूठ कभी बोला नहीं। इस समय सच बोलने की इच्छा नहीं है।’ औरत ने कहा, ‘सच बोलने में क्या डर? सच बोलो।’
वह बोले, ‘चंद्रशेखर आजाद।’ औरत बोली, ‘वही आजाद जो फरार है। जिसकी जिंदा व मुर्दा गिरफ्तारी पर सरकार ने 15 हजार का इनाम घोषित किया है।’ आजाद बोले, ‘हां।’ औरत ने पूछा, ‘तुम्हारा अपराध?’ आजाद बोले, ‘देशभक्ति। अंग्रेजी शासन अब और सहन नहीं होता।’ औरत बोली, ‘धन्य है तुम्हारा संकल्प। आजाद काफी देर रात तक इस घर में ठहरकर चले गए। पर, आजाद का उस दिन जो इस घर से नाता जुड़ा तो जीवन भर जुड़ा रहा।