एचआईवी के मरीजों का इम्यून सिस्टम बेहद कमजोर माना जाता है। इसलिए विभिन्न रिपोर्टों में कहा गया कि इन मरीजों पर वायरस का खतरा अधिक है। लेकिन केजीएमयू ने पुख्ता रणनीति से इन मरीजों में कोरोना का असर घटाने में सफलता पाई है।
यहां भर्ती होने वाले 30 मरीजों में सिर्फ दो को जान गंवानी पड़ी है। बाकी को बचा लिया गया। केजीएमयू प्रशासन अब इन मरीजों पर अलग से अध्ययन करने के लिए प्रोजेक्ट बना रहा है। केजीएमयू के एआरटी सेंटर से करीब 2800 एचआईवी पीड़ित जुड़े हैं।
कोरोना को लेकर केजीएमयू ने रणनीति के तहत यहां से जुड़े सीतापुर, हरदोई, लखीमपुर सेंटर को भरपूर दवाएं भेजी। मरीजों को संबंधित क्षेत्र के सेंटर से दवाएं दी गईं। विहान संस्था के जरिए 15 सौ मरीजों के घर दवाएं भेजीं। प्रतिदिन 100 से 150 मरीजों को फोन कर कोरोना से बचने के तरीके समझाए।
इसलिए मृत्युदर में आई कमी
केजीएमयू के डॉ. सौरभ पालीवाल और डॉ. नीतू ने बताया कि जिन एचआईवी मरीज में कोराना की रिपोर्ट पॉजिटिव आई उन्हें केजीएमयू में तत्काल भर्ती कराया गया। उनके लिए अलग वार्ड बनाया गया। यहां भर्ती हुए 30 मरीजों में सिर्फ दो की मौत हुई, अन्य सभी को बचा लिया गया।
केजीएमयू में संक्रामक रोग नियंत्रण यूनिट के प्रभारी डॉ. डी हिमांशु ने बताया कि एचआईवी मरीजों को पहले से कई एंटीवायरल दवाएं दी जा रही थीं। कोरोना के मरीजों में भी कुछ ऐसी दवाएं दी गईं, जिनका प्रयोग एचआईवी मरीजों में पहले से ही किया जा रहा है।
ऐसे में माना जा रहा है कि पहले से एंटीवायरल दवाएं लेने से एचआईवी वाले मरीजों पर कोविड-19 का असर कम हुआ। यह भी माना जा रहा है कि इन मरीजों में साइटोकाइन रिएक्शन भी कम हुआ है। एक्सरे रिपोर्ट में फेफड़ों का संक्रमण कम पाया गया। कोरोना की चपेट में आने वाले एचआईवी मरीजों का डाटा रखा गया है। इस पर अलग से विश्लेषण किया जाएगा।
क्या है साइटोकाइन रिएक्शन
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है जब हमारे शरीर में कोई नई कोशिका प्रवेश करती है तो प्रतिरक्षा कोशिकाओं से एक रसायन पैदा होता है, जिसे साइटोकाइन कहां जाता है। लेकिन कोविड-19 में यह देखा गया है कि शरीर में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अधिक होती है। शरीर में साइटोकाइन का अति प्रवाह होने लगता है। इससे कई बार संक्रमण बढ़ता है और अन्य महत्वपूर्ण अंगों की कोशिकाओं को नुकसान होता है।
टूथ ब्रश से भी एचआईवी संक्रमण का खतरा
टूथ ब्रश का इस्तेमाल करते समय कई बार मसूड़ों से खून निकल आता है। ऐसे में यदि किसी एचआईवी पॉजिटिव का ब्रश दूसरा व्यक्ति उपयोग में लेता है तो वह भी एचआईवी की चपेट में आ सकता है। यह बात केजीएमयू के पैरामेडिकल डीन प्रो. विनोद जैन ने सोमवार को एचआईवी की रोकथाम पर आयोजित कार्यक्रम में कही। उन्होंने बताया कि गत 20 वर्षों में नई दवा व जीवनशैली में सुधार से काफी हद तक वायरस काबू में आया है। इससे नए मामले 39 प्रतिशत घटे हैं तो मृत्युदर 51 प्रतिशत घटी है।