बात अंग्रेजी हुकूमत के इस दौर की है जब अंग्रेज अफसरों के घरों में आमतौर पर हिंदुस्तानियों का प्रवेश प्रतिबंधित हुआ करता था। उस समय कोई बड़ा अंग्रेज अफसर किसी भारतीय का स्वागत करे तो ताज्जुब ही माना जाएगा। उनका जन्म तो मथुरा में हुआ था और पैतृक घर अलीगढ़ में था, पर पत्रकारिता और व्यवसाय में रुचि के चलते वह 22 वर्ष की उम्र में ही लखनऊ आ गए।
लखनऊ में उन्होंने ‘नवल किशोर प्रेस’ स्थापित किया, जिसने उर्दू, फारसी, अरबी, संस्कृत सहित धार्मिक, सामाजिक और अन्य कई विषयों पर पुस्तकें छापीं। कुरान व गीता के भी कई संस्करण छापे। ख्याति इतनी बढ़ी कि इस प्रेस को उस समय दुनिया के नंबर एक पेरिस के एलपाइन प्रेस के बाद दूसरा दर्जा दिया जाने लगा।
इन्होंने ही लखनऊ में अपर इंडिया कूपन पेपर मिल स्थापित कर उत्तर भारत में कागज बनाने का पहला कारखाना स्थापित करने का कीर्तिमान बनाया। बात हो रही है मुंशी नवल किशोर की। इतिहासविद् प्रो. पंकज कुमार बताते हैं, ‘प्रसंग 1883 का है।
दिसंबर की कड़ाके की ठंड। मिस्टर ह्यूम लखनऊ में थे। एक दिन पहले ही रात में सभी से कह चुके थे कि कल सुबह एक विशेष मेहमान आने वाले हैं। इसलिए सुबह से उनके बंगले पर साफ-सफाई और स्वागत की तैयारी चल रही थी।