डॉ. पी के दास।
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हमारे अस्पताल में 100 बेड पर मरीज भर्ती हैं। इनमें दो माह और छह माह के बच्चे भी हैं। कभी मां भर्ती हो रही है तो कभी पिता...। ये हालात विचलित करते हैं। जिस तरह से पिता अपने बच्चों का ख्याल रखता है, उसी तरह नोडल प्रभारी होने के नाते सभी मरीजों की देखरेख करना मेरी जिम्मेदारी है। ऐसे में एक, दो नहीं बल्कि सौ बच्चों के पिता की भूमिका निभानी पड़ती है।
मां दूर से ही आशीर्वाद देती है...मन तड़प उठता है कि पास होकर कितने दूर हो गए हम
घर में अलग कमरे में रहता हूं। इस कमरे में बुजुर्ग माता-पिता को भी आने से मना कर रखा है। घर पहुंचता हूं तो अपने कमरे से ही मां आवाज देती हैं। सब बढ़िया है...ये कहकर सोने की कोशिश करता हूं, लेकिन जिम्मेदारी इतनी है कि नींद नहीं आती। सुबह निकलता हूं तो मां दूर से ही आशीर्वाद देती हैं।
कहती हैं, हम लोगों की चिंता किए बगैर डटे रहो। घर में रहकर भी कितने दूर हो गए हैं हम। कई बार जब वह आशीर्वाद देती है तो ये सोच कर मन तड़प उठता है। पर, आंखों को नम नहीं होने देते। क्योंकि हमें पता है कि सेनापति का हौसला टूटने का मतलब क्या होता है। हौसला टूटा नहीं कि हार निश्चित है। इसलिए अपनी टीम को इरादों से मजबूत बनाए रखने के लिए हर दर्द को सीने में दफन करता रहता हूं।
एक डर तो बना रहता है...पर माता-पिता की सीख देती है हौसला
हमारा फोन 24 घंटे ऑन रहता है। वक्त-बेवक्त हमारे लिए कुछ नहीं। पत्नी हाउस वाइफ हैं। दोनों बच्चे छोटे हैं। माता-पिता बुजुर्ग हो गए हैं। ऐसे में खुद को लेकर भी एक डर बना रहता है कि कहीं कुछ हो गया तो पूरा परिवार बिखर जाएगा। कई तरह की शंकाएं मन में आती हैं, लेकिन कर्तव्यमार्ग पर डटे रहने की माता-पिता की सीख हौसला बढ़ाती रहती है।
कोरोना से जंग जीतने वाले मरीज का स्वागत करते एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. आरके धीमान व संस्थान के अन्य चिकित्सक।
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एसजीपीजीआई को राजधानी कोविड अस्पताल बनाने की घोषणा होने से लेकर अब तक 24 घंटे में बमुश्किल चार घंटे की नींद ही मिल पाती है। ऐसा लगता है जैसे जिंदगी मशीन से भी तेज हो गई है। पूरी दिनचर्या बदल गई है। शरीर में दर्द बना रहता है। फिर भी हम निरंतर काम कर रहे हैं।
अब तो घर आने पर भी 100-100 कॉल हो जाती हैं
ऑफिस से घर आने पर भी मोबाइल पर कॉल आती रहती हैं। पहले जहां प्रतिदिन 24 घंटे में 10 कॉल रिसीव करते थे, अब 100-100 कॉल हो जाती हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, बायो मेडिकल वेस्ट, किचन, ट्रांसपोर्टेशन सहित सभी बातों पर गौर करना होता है। टीम को निर्देश देना ही काफी नहीं होता। काम पूरा हुआ या नहीं, इस सब पर लगातार फोकस करना होता है। मुख्यमंत्री सहित शासन के अधिकारियों, पीजीआई के निदेशक सहित अन्य को पूरी जानकारी देनी होती है।
घर सिर्फ सोने के लिए जाते हैं...सो भी नहीं पाते...बच्चों को भी नहीं दे पाते समय
हर साल गर्मी के दिनों में अवकाश पर चले जाते थे। इस बार कोई अवकाश नहीं। घर में सिर्फ सोने के लिए जाते हैं। उस दौरान भी मोबाइल बजता रहता है। पूरा परिवार डिस्टर्ब न हो, इसलिए अलग कमरे में रहते हैं। पत्नी डॉक्टर हैं। वह भी व्यस्त रहती हैं। ऐसे में दोनों बच्चों की देखभाल नहीं हो पाती है। उनके लिए हम दोनों वक्त नहीं निकाल पाते हैं। लेकिन यह समझा दिया है कि कोरोना काल में जिस तरह से आप दोनों मेरी जिम्मेदारी हो, उसी तरह से यहां आने वाले हर मरीज की जान बचाना भी जिम्मेदारी है।