अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे राजनेता हैं जिनका विरोधी विचारधारा के लोगों से भी काफी मेलजोल रहा है। समाजवादी चिंतक दीपक मिश्र बताते हैं कि उन्होंने कहीं एक प्रसंग पढ़ा था। जिसके अनुसार, 'अटल जी एक बार गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल में जनसंघ के सम्मेलन में थे। संयोग से उस दिन डॉ. राममनोहर लोहिया भी लखनऊ में थे।
सम्मेलन में अटल जी के कानों में एक व्यक्ति ने कुछ कहा तो अटल जी ने नाना जी देशमुख से कहा, 'मेरे पेट में दर्द हो रहा है। मैं बोल नहीं पाऊंगा। इसलिए जाना चाहता हूं।' अटल जी वहां से चले आए। पर, नाना जी भी कम नहीं, उन्होंने अटल जी के निकलते ही किसी को उनके पीछे भेज दिया। अटल जी वहां से निकलकर काफी हाऊस पहुंचे जहां लोहिया जी बैठे थे। उन्होंने लोहिया जी से बात की। कुछ देर बाद लोहिया जी उठे उन्हें दिल्ली जाना था। अटल जी भी उनके साथ चारबाग स्टेशन तक गए। लोहिया जी को गाड़ी में बैठाकर वह लौटे तो दारुलशफा में उनका सामना नाना जी से हो गया। नाना जी ने जैसे ही अटल जी को देखा तो बोले, 'अब तुम्हारे पेट का दर्द कैसा है।'
अटल जी सवाल सुनकर मुस्करा दिए। नाना जी ने साथ मौजूद जनसंघ की नेता पीतांबर दास से कहा, 'देखो मैं कह रहा था न कि अटल का पेट कभी खराब नहीं हो सकता। इनके पेट में मरोड़ दर्द से नहीं बल्कि लोहिया जी से मिलने की हो रही थी।' नाना के इतना कहते ही अटल जी ने भी ठहाका लगाया और बोले, 'आप सचमुच में नाना है।'
देश के साथ 22 राज्यों में सत्ता संभालने वाली भाजपा के नेताओं के लिए आज भले ही चार्टर प्लेन से चलना भी कोई समस्या न हो लेकिन इस पार्टी के जड़े जमाने वाले पं. दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी को प्रांरभिक दिनों में काफी संघर्ष करना पड़ा। बेल को भूनकर भूख मिटाना, लोगों तक विचार पहुंचाने के लिए पत्रिका के प्रकाशन की जिम्मेदारी तो उसे कंधे पर लादकर दुकानों तक पहुंचाने का भी दायित्व। बचे वक्त में संघ और जनसंघ का आधार बढ़ाने के लिए लखनऊ की सड़कों पर कई-कई घंटे पैदल चलकर लोगों से संपर्क और संवाद। संघ की पत्रिका राष्ट्रधर्म के प्रथम प्रकाशक राधेश्याम प्रसाद ने एक प्रसंग में जो कुछ लिखा है, उससे इसका पता चलता है।
राधेश्याम लिखते हैं, 'एक दिन नाना जी देशमुख मेरी दुकान पर आए और बोले, 'प्रेस आकर हिसाब-किताब तो देख लो।' उन दिनों राष्ट्रधर्म का प्रकाशन सदर बाजार से होता था। दुकान बंद करके रात में प्रेस गया। वहां देखा कि हॉल में दोनों ओर तार लगाकर कपड़े के परदों से केबिन बना दिए गए हैं। अंदर एक मेज और बरामदे में एक तख्त। गर्मियों के दिन थे। रात में काम खत्म हुआ तो दीनदयाल जी ने मुझे दरी, चादर और तकिया दे दिया।
मुझे उन लोगों से पूछने का भी ध्यान नहीं रहा और तख्त पर सो गया। प्रात: काल नींद खुली तो वहां के दृश्य देख अचंभित रह गया। आंखों में आंसू भी आ गए। दृश्य यह था कि मेरे ही बराबर नीचे जमीन पर दीनदयाल जी और अटल जी चटाई पर सो रहे थे। तकिया के स्थान पर दोनों लोगों ने अपने सिर के नीचे एक-एक ईंट लगा रखी थी। मैं हड़बड़ा कर उठा और दोनों लोगों को जगाया। फिर कहा, 'आप लोगों ने तो बड़ा अनर्थ कर दिया। ऊपर सोइए।' पं. दीनदयाल उपाध्याय बोले, 'आदत न खराब करिये।' अटल जी ने हंसते हुए कहा, 'जमीन छोड़ दी तो पैर कहां ठहरेंगे।'