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जंग-ए-आजादी की यादें संजोए है राज्य संग्रहालय, मानो इतिहास आंखों के सामने चल रहा हो

Thu, 15 Aug 2019 04:00 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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राज्य संग्रहालय - फोटो : amar ujala
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राज्य संग्रहालय में जंग-ए-आजादी की तमाम इबारतें आजादी के इतिहास को बखानती हैं। अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद का दुर्लभ अस्थि कलश, आजादी के पहले गदर से लेकर देश के आजाद होने तक के अंग्रेज शासकों की धातु और संगमरमर की विशालकाय प्रतिमाएं भी यहां है। इन्हें एकबारगी देखने भर से ही अंग्रेजी शासकों की मौजूदगी का अहसास होने लगता है। शस्त्र वीथिका की नक्काशीदार पिस्तौलें, आदमकद बंदूकें, क्विंटल वजनी तोपें गदर का अहसास कराती हैं। 
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आजादी से पहले के हथियारों का है भंडार
पुराने जमाने के हथियारों, अस्त्र-शस्त्रों का भव्य कलेक्शन संग्रहालय की शस्त्र वीथिका में है। राजा-महाराजाओं के हथियारों के अलावा मुगलकाल के शस्त्रों, अंग्रेजों के जमाने में इस्तेमाल किए जाने वाले धनुष-बाण से लेकर अंग्रेजों और क्रांतिकारियों के बीच होने वाली टक्कर में गरज चुकीं रिवॉल्वर, बंदूकों का जखीरा है। दो मीटर तक की बंदूकें भी यहां दिखती हैं। तलवारें जरूर मुगलों और उससे भी पहले की हैं, लेकिन आग्नेयास्त्र अंग्रेजों के आने के बाद के बताए जाते हैं।

मशीनगन के साथ आदमकद बंदूकें और तलवारें
वीथिका में मशीनगन (जिस पर 1918 ई. अंकित है) आकर्षण चुराती हैं तो कई नालों वाली बंदूक भी यहां दिखती है। बंदूक पर महाराजा प्रकाश सिंह बहादुर अंकित है। इसके अलावा चकमकी बंदूक (फ्लिंट लॉकगन) जो चकमक के पत्थरों से आग पैदा करती और बारूद भरे होने पर चलती थी, भी यहां है। फ्लिंट पैन यांत्रिकी के चलते इसे चकमकी बंदूक कहा जाता है।
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इसके अलावा लंबी नाल, बारूद भर कर पलीते से जलाकर चलाने वाली तोड़ेदार बंदूक मैच लॉकगन भी रखी है। गदर के समय ऐसी बंदूकों का जिक्र कई जगह आता है, जिसमें बारूद भर कर पलीते में आग लगा फायर किया जाता था। बाह्य आक्रमणकारियों से टक्कर लेने और पहाड़ी इलाकों में सिख योद्धाओं की ओर से इस्तेमाल की जाने वाली शेर बच्चा बंदूक भी खास है। वीथिका में तलवारों, पट्टा, शमशीर, किलिज, खड़ग, किर्च की लंबी शृंखला है।
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आजाद के अस्थि कलश का दुर्लभ कलेक्शन भी

27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते हुए खुद को भारत मां पर न्यौछावर कर दिया था। इलाहाबाद के पार्क में वे आखिरी बार दिखे थे। हालांकि, मूंछों पर ताव देते शहीद ‘चंद्रशेखर आजाद’ स्मृतियों के साथ राजधानीवासियों के दिलों में बसते हैं। राज्य संग्रहालय में उनकी अस्थियों का दुर्लभतम कलश दशकों से सहेज कर रखा हुआ है।

ये दुर्लभ कृतियों की उस श्रेणी में है, जिसे हमेशा देखा नहीं जा सकता। यह खास सुरक्षा के बीच संग्रहालय भंडार में रखा रहता है। विशेष मौकों पर ही खास वीथिका केस में यह दर्शकों के लिए निकाला जाता है। राज्य संग्रहालय के पासआजाद का यह दुर्लभ कलेेक्शन करीब चार दशकों से है। इसे उनके दाह संस्कार के पास करीबी पं. शिवनायक मिश्र ने संग्रहित कर लिया था। उनके बाद इसकी शोभायात्रा वाराणसी विद्यापीठ से एक अगस्त 1976 से शुरू हुई, जो 10 अगस्त 1976 को राज्य संग्रहालय पहुंची। तबसे दुर्लभ कृति यहीं की होकर रह गई।

अंग्रेजी शासकों के ठहराव का अहसास कराती हैं प्रतिमाएं
लंदन के महल में सिंहासन पर विराजने वाली क्वीन विक्टोरिया, रौबीले चेहरे वाले जार्ज पंचम, घोड़े पर सवार मि. बटलर, गैलरी में घुसते ही बोलने को आतुर, एक झलक में सजीव सी लगतीं अंग्रेजी शासकों की प्रतिमाएं आकर्षण का केंद्र हैं। संग्रहालय परिसर में बनी विदेशी शासकों की वीथिका में जार्ज पंचम, क्वीन विक्टोरिया समेत अन्य शासकों की धातु, पत्थर से बनी दो दर्जन से अधिक प्रतिमाएं अलग विराजी हैं।

महारानी विक्टोरिया की प्रतिमाएं खड़े होने के अलावा सिंहासन पर विराजने वाली मुद्रा में हैं तो जार्ज पंचम, बटलर आदि की प्रतिमाएं हैट के साथ चलायमान अंदाज में हैं। समय बीतने के साथ कुछ प्रतिमाएं आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुई हैं, लेकिन इनकी फिनिशिंग और बनावट आज भी लुभाती हैं।
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