राज्य विधि आयोग ने परिवार के बीच संपत्ति के बंटवारे को सरल और निर्विवाद बनाने के लिए स्टांप शुल्क अधिकतम पांच हजार रुपये और निबंधन शुल्क अधिकतम दो हजार रुपये करने की सिफारिश की है। आयोग के अध्यक्ष आदित्य नाथ मित्तल ने परिवार के सदस्यों के बीच अचल संपत्ति के अंतरण विषयक विलेखों पर स्टांप शुल्क अदायगी को तर्कसंगत बनाने के लिए रिपोर्ट और अधिसूचना का मसौदा सोमवार को मुख्यमंत्री को प्रस्तुत किया।
आयोग का मानना है कि परिवार का मुखिया अपने जीवनकाल में ही अपनी विधवा बेटी, बहन, बहू, पौत्री या आर्थिक एवं शारीरिक रूप से कमजोर सदस्य को पारिवारिक संपत्ति दान करना या उसका बंटवारा करना चाहता है। लेकिन स्टांप शुल्क अधिक होने की वजह से वह रजिस्ट्री से परहेज करता है। प्रदेश में संपत्ति हस्तांतरण पर शहर में सर्किल रेट का 7 प्रतिशत स्टांप शुल्क और दो प्रतिशत निबंधन शुल्क लिया जाता है। जबकि महिलाओं के लिए स्टांप शुल्क 6 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्टांप शुल्क क्रमश: 5 और 4 प्रतिशत है।
स्टांप शुल्क से बचने के लिए वसीयत
आयोग का मानना है कि स्टांप शुल्क से बचने के लिए संपत्ति के मालिक की ओर से परिवार के सदस्यों के नाम वसीयत लिखी जाती है। लेकिन मुखिया के निधन के बाद वसीयत के अधिकांश मामलों में विवाद होता है। आयोग के अनुसार 2020 में 46,333 दानपत्र, 56 पारिवारिक व्यवस्थापन और 1,63,638 वसीयतनामे जारी किए गए। 2018 से 2020 के बीच 37 जिलों के विभिन्न न्यायालयों में वसीयत, पारिवारिक व्यवस्थापन और दानपत्र को लेकर 20,145 मामले दायर किए गए।
अन्य राज्यों में स्टांप ड्यूटी कम
बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडू, तेलंगाना में ऐसे मामलों में स्टांप शुल्क .2 से .3 प्रतिशत है। कर्नाटक में अधिकतम पांच हजार रुपये, केरल में दानपत्र पर एक हजार रुपये, महाराष्ट्र में आवासीय या कृषि संपत्ति के दानपत्र पर स्टांप शुल्क 200 रुपये मात्र है।
विवाद होंगे कम, राजस्व प्राप्ति भी
आयोग का मानना है कि परिवार के बीच अचल संपत्ति के बंटवारे में स्टांप शुल्क कम होने से विधिक प्रक्रिया के अनुसार संपत्ति का बंटवारा आसान होगा। इससे परिवार के सदस्यों के बीच विवाद व झगड़े कम होंगे। इसके चलते होने वाले अपराध भी कम होंगे। सरकार को राजस्व प्राप्ति भी होगी।