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यौन उत्पीड़न पर जल्द नपेंगे सरकारी कर्मचारी

Mon, 26 May 2014 02:56 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
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प्रदेश सरकार ने यौन उत्पीड़न मामले में सु्प्रीम कोर्ट के आदेश पर कार्यवाहीं करने के लिए आयोग से राय मांगी है। महिलाओं के मान-सम्मान व सुरक्षा के लिहाज से सुप्रीमकोर्ट का एक अहम फैसला करीब डेढ़ साल से शासन की अलमारियों में धूल फांकता रहा।
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पर, लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सरकार को इस फाइल की याद आ गई है। इसे सरकार की छवि सुधार की एक अहम पहल कहें या कुछ और।

शासन ने यौन उत्पीड़न मामलों में सरकारी सेवकों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्यवाही के लिए उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली में संशोधन का फैसला कर लिया है। शासन ने इसके लिए राज्य लोक सेवा आयोग को जल्द से जल्द परामर्श उपलब्ध कराने को कहा है।

यह था कोर्ट का आदेश

सुप्रीमकोर्ट ने 19 अक्टूबर 2012 को मेधा कोतवाल लेले व अन्य बनाम भारत सरकार व अन्य में एक अहम फैसला सुनाया था।

इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने आदेशित किया था कि यौन उत्पीड़न की शिकायतों की जांच करने वाली समितियों की रिपोर्ट को अनुशासनिक कार्यवाही के लिए केवल प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के रूप में न माना जाए।

सर्वोच्च अदालत ने शिकायत समिति की रिपोर्ट को अनुशासनिक जांच के निष्कर्ष के समान मानते हुए दोषी सरकारी सेवक के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही करने को कहा था।
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नियमों में संसोधन जरूरी

प्रदेश के कार्मिक विभाग ने सुप्रीमकोर्ट के इस निर्णय के अनुपालन के लिए उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की आचरण नियमावली 1956 तथा उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 1999 में संशोधन की आवश्यकता बताई है।

प्रमुख सचिव कार्मिक राजीव कुमार ने सचिव लोकसेवा आयोग को पत्र लिखकर प्रस्तावित संशोधनों पर आयोग का परामर्श व सहमति उपलब्ध कराने को कहा है। आयोग की सहमति मिलने के बाद सुप्रीमकोर्ट के आदेश को नियमावली में शामिल कर लिया जाएगा।

बताते चलें कि सरकारी कार्यालयों व संस्थानों में इस तरह के मामलों में पहले प्रारंभिक जांच होती है। इसकी रिपोर्ट आने के बाद यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो भी कर्मी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती।

विभाग या संस्थान प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर अनुशासनिक जांच कराते हैं। अनुशासनिक जांच रिपोर्ट आने के बाद ही आरोपी पर कार्रवाई का फैसला होता है। 
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