सरकारी अस्पतालों में चल रही लैब टेक्नीशियनों की हड़ताल के चलते अस्पतालों के वार्डो में भर्ती मरीज जांच के अभाव में दम तोड़ने लगे हैं।
कहने को तो अस्पताल के लैब टेक्नीशियन हड़ताल में भी इमरजेंसी की जांच कर रहे हैं, लेकिन स्थिति एकदम उलट है और दिमागी बुखार से पीड़ित एक बच्चे की जांच न हो पाने के चलते मौत हो गई।
इसके अलावा अस्पताल की ओटी में होने वाले ऑपरेशन की संख्या कम हो गई है।
...तो ऑपरेशन थिएटर भी हो जाएंगे बंद
अस्पताल के अधिकारियों की मानें तो अगर हालात दो दिन तक ऐसे ही रहे तो अस्पतालों की ओटी मरीजों अभाव में बंद हो जाएगी। स्थिति तब गंभीर होगी जब हड़ताल खत्म होगी तब मरीजों की संख्या अधिक होने के चलते क्रइ मरीजों को ऑपरेशन के लिए वेटिंग में रखना पड़ जाएगा।
यूपी लैब टेक्नीशियन की सातवें दिन की हड़ताल मासूम की जान पर भारी पड़ गई। माल के गंगाखेड़ा गांव के मूलचंद के चार वर्षीय बेटे गौरव (बीएचटी संख्या) 30543 को दिमागी बुखार की शिकायत थी।
रविवार को दोपहर करीब साढे़ बारह बजे बच्चे को परिवारीजन बलरामपुर अस्पताल लाए। इमरजेंसी में दिखाने केबाद बच्चे की गंभीर हालत को देखते हुए उसे बाल रोग वार्ड के बेड नंबर 19 पर भर्ती कर लिया गया।
पिता मूलचंद का आरोप था कि दोपहर में भर्ती करने के बाद राउंड पर आए बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर बृजेश कुमार ने खून की जांच कराने की सलाह दी।
इससे पहले दिन में रविवार को छुट्टी का दिन होने के चलते कोई डॉक्टर वार्ड में नहीं पहुंचा।
सुबह जब पिता ने बच्चे के खून का सैंपल लेने के लिए गुहार लगाई तो कर्मचारियों ने हड़ताल का बहाना बनाकर उससे कह दिया कि हड़ताल के बाद ही जांच होगी जबकि इमरजेंसी या अस्पताल में भर्ती सभी मरीजों को चौबीस घंटे जांच की सुविधा है।
सोमवार को दोपहर करीब तीन बजे गौरव की तबियत अचानक बहुत खराब हो गई और थोड़ी देर बाद उसने दम तोड़ दिया। मासूम की मौत के बाद उसकी मां सुषमा और पिता का रो-रोकर बुरा हाल था।
उनका आरोप था कि हड़ताल का बहाना बनाकर बच्चे के खून की जांच नहीं कराई गई और उसे लगातार ग्लूकोज की बोतल चढ़ाकर इलाज की खानापूर्ति की जाती रही।
बच्चे की मौत के बाद परिजनों ने वार्ड में अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया लेकिन मौके पर कोई डॉक्टर या कर्मचारी नहीं पहुंचा। अस्पतालों में सातवें दिन की हड़ताल से अस्पतालों में होने वाले ऑपरेशन की संख्या दिन पर दिन कम होने लगी है।
अस्पताल के सीएमएस डॉ. यूएन राय ने बताया कि बच्चे की हालत गंभीर थी लेकिन उसके खून की जांच क्यों नहीं की गई ये जांच का विषय है।
हालत गंभीर होने पर रविवार को भी हर हाल में जांच होनी चाहिए थी जिससे उसकी जांच शुरू हो सके। वहीं अस्पताल के विशेषज्ञों की मानें तो पिछले सात दिनों से किसी नए मरीज जांच रिपोर्ट न मिलने के चलते उसे ऑपरेशन की तारीख नहीं दी जा रही है।
अब जब नए मरीज नहीं मिलेंगे तो अस्पताल की ओटी मरीजों के अभाव में बंद करनी पड़ेगी।
सिविल, बलरामपुर और लोहिया अस्पताल में रोजाना डेढ़ सौ से अधिक की संख्या में छोटे-बडे़ ऑपरेशन किए जाते थे लेकिन हड़ताल के चलते अब ऑपरेशन का आंकड़ा 65 से 70 के करीब पहुंच गया है।