किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) ‘जीवनदूत’ तैयार करेगा। यहां का ट्रॉमा एंड इमरजेंसी मेडिसिन विभाग दुर्घटना में घायल लोगों का जीवन बचाने के लिए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है।
इस प्रशिक्षण को एडवांस ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट (एटीएलएस) और बेसिक लाइफ सपोर्ट (बीएलएस) ट्रेनिंग का नाम दिया गया है। एटीएलएस डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के लिए होगा जबकि बीएलएस सामान्य नागरिकों के लिए।
देनी होगी फीस
प्रशिक्षण के लिए केजीएमयू एक निश्चित शुल्क भी लेगा। केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर के प्रभारी प्रो. विनीत शर्मा ने बताया कि दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के पहले पांच मिनट काफी महत्वपूर्ण होते हैं।
दुर्घटनाग्रस्त लोगों में 30 प्रतिशत की जिंदगी सांस की रुकावट दूरकर और रक्त संचार बढ़ाकर बचाई जा सकती है। मरीज जब तक अस्पताल न पहुंच जाए, उसके दिल की धड़कन को हथेली से दबाव देते हुए जारी रखने का प्रयास रखना चाहिए जिससे शरीर के सभी अंगों को खून की आपूर्ति होती रहे।
खासतौर से मस्तिष्क को खून पहुंचना बहुत जरूरी है क्योंकि किसी भी व्यक्ति का दिमाग बिना ऑक्सीजन के केवल तीन से पांच मिनट तक ही काम कर सकता है। ऐसे में मरीज को अस्पताल पहुंचने तक लाइफ सपोर्ट मिलना बहुत जरूरी है जिसमें किसी उपकरण की जरूरत नहीं पड़ती।
सिर्फ प्रशिक्षण और जागरूकता से मरीजों को बचाया जा सकता है। यही वजह है कि हमने एटीएलएस और बीएलएस प्रशिक्षण शुरू करने का फैसला किया है।
एबीसीडीई है जीवनरक्षा का मंत्रप्रो. शर्मा ने बताया कि एटीएलएस के तहत नई गाइडलाइन जारी की गई है जिसमें पांच चरणों का पालन करने की सलाह दी गई है। ये मंत्र है-‘एबीसीडीई’ जो दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की जिंदगी बचाने के काम आता है।
‘ए’ का मतलब है एयर-वे यानी सांस की रुकावट को दूर करने के लिए मुंह खोलना, ‘बी’ का ब्रीथिंग यानी मुंह से मुंह मिलाकर सांस देना, ‘सी’ यानी सर्कुलेशन मतलब छाती के बीच में जल्दी दबाव डालकर रक्त संचार बढ़ाना, ‘डी’ का मतलब डिसएबिलिटी का पता करना और ‘ई’ का मतलब है एक्सपोज फॉर कम्प्लीट एक्जाम यानी शरीर के हर अंग का परीक्षण करना।
ऐसे कर सकते हैं मददप्रो. शर्मा के अनुसार दिमाग का रक्त संचार बंद होने पर तीन से पांच मिनट में व्यक्ति की मौत हो सकती है, इसलिए दिल को पंप करना जरूरी है। दुर्घटना की हाल में घायल के दिल को एक मिनट में 100 बार पंप करना चाहिए।
उन्होंने बताया कि दुर्घटनास्थल के सबसे नजदीक जो भी होता है, वह पीड़ित व्यक्ति को तुरंत सहायता देकर उसे जीवनदान दे सकता है। इमरजेंसी मदद देने का प्रशिक्षण सभी को मिलना चाहिए।