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'ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां, अलविदा'

Sun, 18 Jan 2015 02:50 PM IST
अभिषेक सहज/अमर उजाला, लखनऊ
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मैं मलिहाबाद बोल रहा हूं। वही, जिसकी सरजमीं को न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि अन्य मुल्कों में भी आम की मिठास और उर्दू शायरी के लिए जाना जाता है। जोश मलिहाबादी जैसे अजीम शायरों ने अपने नाम के साथ मुझे जोड़कर मेरा नाम रोशन किया।
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जाफर मलिहाबादी, जलाल और माहिल मलिहाबादी ने भी मेरी इज्जत अफजाई की। मेरी सरजमीं पर फलों के राजा आम की तकरीबन डेढ़ सौ किस्में आज भी दुनिया भर में अपनी मिठास लुटाती हैं, लेकिन इस हंसते-खिलखिलाते गुलिस्तां को न जाने किसकी नजर लग गई कि दरख्तों पर कुल्हाड़े चलने लगे और मैं बेजार होकर कंक्रीट की इमारतों में तब्दील होने लगा। अब यहां शेरो-सुखन की महफिलें नहीं, बल्कि नशे का कारोबार अपने शबाब पर है।

लखनऊ के विद्यांत कॉलेज में उर्दू के शिक्षक और शायर डॉ. असमत मलिहाबादी बताते हैं कि राजधानी से सटे इस इलाके के आर्थिक रूप से पिछड़ने और सामाजिक ढांचे में असमानता के लिए बहुत हद तक सरकारें और प्रशासनिक उपेक्षा जिम्मेदार है।
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खुलेआम हरियाली को काटकर कंक्रीट की इमारतें खड़ी की जा रही हैं और पुलिस के संरक्षण में अवैध शराब का कारोबार हो रहा है। वे कहते हैं, जोश मलिहाबादी को तो इस सरजमीं से इतनी मोहब्बत थी कि उन्होंने यहां से पाकिस्तान जाते समय कहा था-
ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां, अलविदा
अलविदा ऐ किश्वरे शाहे सबिस्तां,
तेरे घर से एक जिंदा लाश उठ जाने को है
आ गले मिल लें कि आवाजे जरम आने को है।
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काश! ‘अफसर बिटिया’ लैपटॉप चलाना सीख पाती

दतली की साक्षी बीए फाइनल ईयर की स्टूडेंट है। कालीचरण डिग्री कॉलेज में पढ़ती है। उसके पिता लल्लू भी उस दिन जहरीली शराब के शिकार बन गए। साक्षी ने पिता को कई बार समझाया, पर लत छूटी नहीं। जिंदगी ने साथ जरूर छोड़ दिया।

अपनी लगन से कॉलेज तक पहुंची साक्षी अपने दो छोटे भाइयों के लिए प्रेरणा तो बनी... पर अब क्या? पूरे परिवार को यही चिंता खाए जा रही है कि अब जिंदगी किस करवट बैठेगी। सरकार से लैपटॉप मिला तो सबने कहा- बिटिया अफसर बनेगी, पर घर में बिजली थी नहीं तो साक्षी लैपटॉप चलाना नहीं सीख सकी।

कहती है... काश! बिजली होती तो उसकी रोशनी में भविष्य की तस्वीर अधिक उजली होती...। फिर दूर एक चबूतरे पर उसकी निगाह ठहर जाती है। कुछ सोचती है... अनायास बोल पड़ती है... शायद लैपटॉप चलाना सीख पाती तो परिवार में बदलाव होता... शायद पिता पर भी इसका कुछ असर पड़ता... हम यूं अकेले न हो जाते।

दतली और खड़ता के 90 फीसदी परिवार मजदूरी के भरोसे

जिस दतली-खड़ता गांव में जहरीली शराब पीने से दर्जनों लोग मौत के मुंह में समा गए और बहुत से अब भी जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं, वहां लंबे अरसे से नशे का कारोबार फल-फूल रहा है। इसके लिए अशिक्षा, बेरोजगारी, भौतिकतावादी सोच और पुलिस-प्रशासन का ढुलमुल रवैया जिम्मेदार है।

दतली में तकरीबन चार सौ परिवार हैं जिनमें से नब्बे फीसदी की रोजी-रोटी का जरिया मजदूरी है। खड़ता में भी तीन सौ परिवारों में से ज्यादातर मजदूरी पर ही निर्भर हैं। दोनों गांवों में आधे से ज्यादा लोग कक्षा पांच भी पास नहीं हैं। पूरे ब्लॉक में कमोबेश स्थिति ऐसी ही है।

2011 की जनगणना के अनुसार मलिहाबाद विकास खंड की आबादी 1,69,234 है, जिनमें से महज 67,571 ही साक्षर हैं। खड़ता में निजी विद्यालय चलाने वाले संजीत मौर्य बताते हैं कि यहां लोगों का सारा ध्यान दो जून की रोटी का जुगाड़ करने में ही रहता है। जो संपन्न हैं, वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए लखनऊ भेज देते हैं।

विकलांग पेंशन से घर चलता है, बिजली कहां से आए

पैरों से लाचार खड़ता की बेबी शर्मा को भी इंटर पास करने पर लैपटॉप मिला था। अब वह आदर्श सत्येंद्र महाविद्यालय माल में बीए फाइनल की छात्रा है। सैलून की दुकान चलाकर पिता घर का खर्च चलाते थे। पिछले दिनों उनका एक्सीडेंट हो गया। अब वे दुकान नहीं जा पाते तो आमदनी का जरिया भी बंद हो गया।

बेबी की विकलांग पेंशन से जैसे-तैसे घर का खर्च और पढ़ाई हो पा रही है। ऐसे में बिजली का कनेक्शन कैसे लें? बिजली नहीं तो लैपटॉप किस काम का? बेबी में हौसला है... वह अपने पैरों से नहीं... पर परिस्थितियों के सामने लाचार नजर आती है।

दतली गांव के नन्हू ने अनपढ़ होते हुए भी न केवल अपने चारों बेटों को तालीम दिलाई, बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार भी दिए। नन्हू के बेटे शराब तो दूर, गुटखा, बीड़ी-सिगरेट तक को हाथ नहीं लगाते। 65 साल के नन्हू कहते हैं कि बैलगाड़ी चलाकर परिवार का पेट भरा, शराब को कभी छुआ तक नहीं। नन्हू ने अपनी बहू को भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया। वह लखनऊ के कॉलेज से बीए फाइनल कर रही है।
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जलती हुई चिता पर लेटा है आदमी

मलेरिया विभाग से रिटायर खड़ता गांव के इंद्रपाल मौर्य साहित्यप्रेमी भी हैं। जहरीली शराब के कारण हुई मौतों से दुखी इंद्रपाल कहते हैं कि जब भी साहित्य, शिक्षा और संस्कारों से दूरी होगी, समाज का नैतिक पतन होता रहेगा।

वे कहते हैं कि इसी गांव में पं. शिवराम व पं. जयराम जैसे लोक संगीत के महारथी हुए और उमा महाराज भी कवि थे जिन्हें फाग गायन में महारत हासिल थी। अब नशे की लत से धीरे-धीरे लोगों का नैतिक पतन होने लगा। नतीजा इतनी सारी मौतों के रूप में हमारे सामने है। इंद्रपाल अपनी पीड़ा यूं बयां करते हैं, ‘जलती हुई चिता पर लेटा है आदमी, मुर्दा तो जलके राख है हंसता है आदमी। छुट्टा वो घूमते हैं निर्भय बाजार में, अपराधियों के आगे बेबस है आदमी’।

खंडहर बनी व्यायामशाला, पर नशे की दुकानें गुलजार

दतली और आसपास के क्षेत्र में युवाओं को नशे व अन्य बुराइयों से दूर रखने और उनमें बेहतर स्वास्थ्य की ललक जगाने के लिए वर्ष 1991 में व्यायामशाला बनवाया गया था। तत्कालीन युवा कल्याण मंत्री भगवती सिंह ने दतली में इसका उद्घाटन किया था।
गांव के बुजुर्ग नन्हू बताते हैं कि व्यायामशाला की वजह से युवाओं में भी कुछ बेहतर करने की ललक जगी थी और वे नशे से दूर रहते थे। मगर कुछ समय बाद ही यह व्यायामशाला बंद हो गई। आज यहां सिर्फ खंडहर है। नन्हू कहते हैं, व्यायामशाला क्या बंद हुई, नशे का कारोबार बढ़ता चला गया।
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