विधानसभा उपचुनाव के नतीजों से मंगलवार को तय होगा कि भाजपा की प्रतिष्ठा बरकरार रहती है या नहीं। यह भी पता लगेगा कि खोई साख को बचाने की सपा की जद्दोजहद पर जनता की मुहर लगती है या नहीं।
परिणाम किसी भी दल के पक्ष में जाएं, इनका दूरगामी असर होगा। कुछ हद तक ये नतीजे 2017 के रोड मैप की दिशा भी निर्धारित करेंगे। प्रदेश में विधानसभा की 11 और लोकसभा की मैनपुरी सीट पर 13 सितंबर को उपचुनाव हुए थे।
इनमें मैनपुरी सीट सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के इस्तीफे से खाली हुई थी। जिन 11 सीटों पर विधानसभा उपचुनाव हुए हैं, उनमें वर्ष 2012 में 10 पर भाजपा और एक पर अपना दल को जीत हासिल हुई थी।
सपा के पास साख वापस पाने का मौका
इन सीटों से जीते भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल के विधायक अब सांसद हैं। जाहिर है, इन सीटों पर भाजपा की प्रतिष्ठा ही दांव पर है। वह लोकसभा चुनाव में मिले बंपर जनसमर्थन को कायम रख पाने में सफल रही तो 2017 में प्रदेश की सत्ता के लिए उसकी दावेदारी मजबूत होगी।
वहीं यदि भाजपा एक भी सीट गंवाती है तो इसका असर विधानसभा 2017 के चुनाव की तैयारियों पर भी पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही उपचुनाव में प्रचार के लिए न आए हों, लेकिन नतीजे विपरीत रहने पर विपक्ष प्रचारित करेगा कि मोदी का जादू फीका पड़ रहा है।
सपा के लिए भी उपचुनावों का महत्व कम नहीं है। प्रदेश में बहुमत की सरकार के बावजूद लोकसभा चुनाव में उसकी करारी हार हुई थी। सपा महज पांच सीटों तक सिमट गई थी। इन उपचुनावों के जरिये सपा ने लोकसभा चुनाव में धूमिल हुई साख को वापस पाने का पूरा प्रयास किया।
नतीजे बताएंगे कि उसकी कोशिशों पर जनता की कितनी मुहर लगी। यदि भाजपा से विधानसभा की कुछ सीटें छीनने में सपा कामयाब रही तो उसे यह दावा करने का मौका मिल जाएगा कि सांप्रदायिक ताकतों को रोकने की क्षमता सिर्फ उसमें है।
कम वोटिंग से उलझे समीकरण
विधानसभा की सभी सीटों पर वोटिंग अपेक्षाकृत कम हुई है। लखनऊ पूरब व नोएडा जैसी शहरी सीटों पर वर्ष 2012 की तुलना में क्रमश: 19.13 और 16.48 प्रतिशत कम वोटर बूथों पर पहुंचे। बिजनौर, सिराथू (कौशांबी) और सहारनपुर नगर पर 2012 की तुलना में 8 से 9 प्रतिशत कम मतदान हुआ है।
मैनपुरी से तीसरी पीढ़ी की एंट्री पर नजर
मैनपुरी में सपा मुखिया मुलायम की प्रतिष्ठा के साथ ही उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी की लोकसभा में एंट्री पर नजरें टिकी हैं।
सपा मुखिया ने अपने भाई स्व. रतन सिंह के पौत्र और भतीजे स्व. रणबीर सिंह के पुत्र तेज प्रताप सिंह यादव को जिताने के लिए कसर नहीं छोड़ी। इस सीट के नतीजे बताएंगे कि मैनपुरी के लोगों ने परिवारवाद की राजनीति को स्वीकार किया है या नहीं। इस सीट पर हार-जीत के अंतर पर भी नजर रहेगी।
ये सीटे हैं बेहद खास
केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र और उमा भारती के इस्तीफों से खाली हुईं लखनऊ पूरब और चरखारी सीट के नतीजों पर भी नजर रहेगी। लखनऊ पूरब राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र है, इस नाते भी यहां के चुनाव परिणाम को उनसे जोड़ा जाएगा।
गौरतलब है कि 2012 में कलराज ने लखनऊ पूरब सीट पर 20 हजार से ज्यादा मतों से बढ़त ली थी जबकि लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में राजनाथ सिंह एक लाख से ज्यादा वोटों से आगे रहे थे।
बसपा की गैरहाजिरी का कितना लाभ?
उपचुनावों से बसपा गैरहाजिर रही। उसने निर्दलीय प्रत्याशियों को समर्थन देने का ऐलान किया था। चुनाव परिणामों से यह भी साफ होगा कि सिर्फ घोषणा मात्र से बसपा अपना वोट बैंक ट्रांसफर करा पाती है या नहीं? उसके वोट बैंक से भाजपा को कितना लाभ मिला? बसपा चुनाव लड़ती तो क्या तस्वीर उभरती?