चाइल्ड लाइन की स्वयंसेविका की गोद में मासूम।
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स्कूटर इंडिया चौराहे पर सोमवार को कोई सात महीने की बच्ची छोड़ गया। राजधानी में बेटियों को बेसहारा छोड़ दिए जाने की यह छह दिन में दूसरी घटना है। चाइल्ड लाइन लखनऊ को सूचना मिलने के बाद यह मैसेज सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। चाइल्ड लाइन निदेशक डॉ. संगीता शर्मा ने स्वयंसेविका गौरी को मौके पर भेजा। उन्होंने सीएचसी पर जांच के बाद बच्ची के बारे में इलाके में पता करने का प्रयास किया, पर जानकारी नहीं मिली। इस पर टीम ने बच्ची को सीडब्ल्यूसी के समक्ष पेश कर राजकीय बालगृह में आश्रय दिलाया। बालगृह के डॉक्टर सुदर्शन ने बच्ची की जांच की तो पता चला कि उसका कंधा उतरा हुआ है। इस पर उसे सिविल अस्पताल ले जाया गया। आशंका है कि बुरी तरह पीटने के बाद बच्ची को छोड़ा गया। यह भी हो सकता है कि चलती गाड़ी से फेंके जाने से उसे यह चोट लगी हो।
दुखद यह भी: बेटियों को अपनाने में आज भी पिछड़ापन
अभी पूरा हफ्ता भी नहीं गुजरा कि दो मासूम बच्चियां सड़क पर मिलीं। इसे लेकर ‘अमर उजाला’ ने दत्तक ग्रहण इकाइयों का जायजा लिया। अडॉप्शन ऑफिसर से बीते वर्षों में आश्रय के लिए भेजे गए बच्चों के आंकड़े खंगाले तो पाया कि बालगृह/दत्तक ग्रहण इकाई आने वाले बच्चों में 70 फीसदी लड़कियां होती हैं। 19 साल से लीलावती मुंशी निराश्रित बालगृह में अडॉप्शन अफसर शिल्पी सक्सेना के मुताबिक, बेटियों को अपनाने में आज भी दोहरापन है। लीलावती मुंशी बालगृह में 23 बच्चों में से 15 लड़कियां हैं। प्राग नारायण शिशु गृह में 25 बच्चों में 17 लड़कियां हैं। बच्चियों को सड़क पर छोड़े जाने से लेकर उनके गोद लेेने तक की प्रक्रिया में ऐसा ही कड़वा सच सामने आया।
- जितने भी लड़के छोड़े या फेंके जाते हैं उनमें से 90 फीसदी में या तो बीमारी होती है या ट्रांसजेंडर होते हैं। सामान्य हालत वाले लड़के बहुत कम फेंके जाते हैं।
- जो बच्चियां आश्रय के लिए आती हैं, वे सुंदर, सामान्य होती हैं। आमतौर पर उनमें कोई बीमारी नहीं मिलती है।
- नोएडा जैसे शहरों में कामकाजी दंपती लड़कियों को गोद लेना चाहते हैं। इसके विपरीत जहां पत्नियां गृहिणी हैं, वहां लड़का प्राथमिकता में होता है। बेटियां तभी गोद ली जाती हैं, जब कोई विकल्प नहीं रहता।
बालगृहों में बच्चियों की संख्या बढ़ना चिंताजनक
डॉ. संगीता शर्मा के मुताबिक, बालगृहों में हमेशा से लड़कियों की संख्या अधिक रही है। हां, यह बदलाव सुखद है कि पढ़े-लिखे लोग अब बेटियों को अपनाने के लिए आने लगे हैं। हालांकि, इतने प्रयासों के बाद भी इसकी रफ्तार सुस्त ही है।