लखनऊ। राजधानी व आसपास के इलाके में प्रॉपर्टी के कारोबार के साथ अवैध वसूली के धंधे में नुकसान होने पर सीरियल किलर भाइयों के करीबी दो गुर्गों जमील व फरहान ने जाली नोट छापने का धंधा शुरू किया था। धीरे-धीरे उन्होंने दिल्ली, पश्चिम बंगाल, मुंबई जैसे बड़े शहरों में भी नेटवर्क बनाना शुरू कर दिया।
एडीसीपी पश्चिम चिरंजीव नाथ सिन्हा के मुताबिक, जमील व फरहान सीरियल किलर भाइयों के लिए अवैध वसूली, प्रॉपर्टी, रंगदारी मांगने काम करते थे। लेकिन पिछले 6-7 सालों से प्रॉपर्टी के कारोबार में घाटा होने लगा। वहीं अवैध वसूली भी नहीं हो पा रही थी। फरहान व जमील ने जाली नोट छापने की तैयारी कर ली। कमिश्नरेट की तालकटोरा पुलिस ने इस अवैध कारोबार का खुलासा 11 जनवरी को किया था। आलमनगर पुल के पास से जीआरपी का सिपाही राहुल सरोज, बिहार के मुबस्सिर, मो. अरबाज, शावेज खान और हसनगंज के सलमान को गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से 500 और 50 के जाली नोट बरामद हुए थे। पूछताछ में पता चला था कि इनके साथ तिहाड़ में बंद सलीम का खास गुर्गा फरहान भी है जो सारा नेटवर्क चला रहा है। फिर फरहान को पकड़ा गया और पूरे नेटवर्क का राजफाश हुआ।
फरहान के खिलाफ हत्या के दो मुकदमे दर्ज हैं। इसके अलावा अन्य के खिलाफ भी केस हैं। सिपाही का पहले का कोई आपराधिक इतिहास अभी नहीं मिला है। गिरोह के लोग नोटों की तस्करी ट्रेन के माध्यम से करते थे। एडीसीपी के अनुसार, पांचों के खिलाफ गिरोह बंद की कार्रवाई के लिए जरूरी दस्तावेज जुटाए जा रहे हैं। इनके खिलाफ गैंगस्टर की कार्रवाई की जाएगी। अपराध से जो भी संपत्ति अर्जित की है, उसे कुर्क किया जाएगा।
फॉरेंसिक जांच में हुई थी पुष्टि
गिरोह ने ठाकुरगंज इलाके में अपना ठिकाना बना रखा था। जहां नोट छापने का काम करते थे। गिरोह केपांच सदस्यों के पकड़े जाने की सूचना मिलते ही अन्य वहां से फरार हो गए थे। यहीं नही सबूत मिटाने के लिए बाल्टी व ड्रम में रखे गये दो हजार, पांच सौ, दो सौ व एक सौ व 50 के नोटों के बंडलों में आग लगा दिया। पुलिस पहुंची तो वहां पर जाली नोटों के अवशेष ही मिले थे। पुलिस ने अवशेष को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा जिसकी जांच रिपोर्ट में जाली नोट छापने की पुष्टि हो गई।
हूबहू असली जैसे नोट छापते थे
पुलिस के मुताबिक, जमील व फरहान जो जाली नोट छापते थे वे हूबहू असली जैसे दिखते थे जिससे एक बार बैंककर्मी भी धोखा खा जाएं। इन नोटों को मार्केट में फैलाने के लिए जमील व फरहान के पास कोई नेटवर्क नहीं था। इसके लिए दोनाें ने सीरियल किलर भाइयों का सहारा लिया। तिहाड़ में बंद सलीम ने इसके लिए हामी भर दी। इसके बदले में सलीम को 30 प्रतिशत कमीशन मिलता था। वहीं जो गुर्गे नोट बाजारों में चलाने लेकर जाते थे, उनको भी 5 से 10 प्रतिशत कमीशन मिलने लगा।