देखा जाए तो बाहुबलियों के बड़े दलों या सत्ताधारी दल में प्रवेश का माध्यम भी यही छोटे दल बनते हैं। लोकसभा और विधानसभा के पिछले कई चुनाव इस बात के गवाह हैं कि छोटे दल समझौते में मिली सीटों पर अपने काडर के लोगों के बजाय बाहरी को ही चुनाव लड़ाते हैं। इनमें वे लोग शामिल होते हैं जो या तो बाहुबली या माफिया छवि के हैं, या किसी बड़े दल ने जिनका टिकट काट दिया हो। 2017 के चुनाव में भी सत्ताधारी दल से गठबंधन करने वाले दलों ने ऐसा ही किया था।
उदाहरण के तौर पर शाहगंज, अजगरा, दुद्धी, मडियाहूं, छानबे जैसी कई सीटों पर लड़े उम्मीदवारों को देखा जा सकता है। इस बार भी सपा और भाजपा से गठबंधन करने वाले छोटे दलों से कई माफिया व बाहुबली चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। इन सबने भी सीटों के लिए मोलभाव शुरू कर दिए हैं।
चुनाव के समय ही बढ़ती है सक्रियता
सक्रियता के आधार पर आकलन किया जाए तो जातिगत आधार पर जन्म लेने वाले ऐसे छोटे दल करीब साढ़े चार साल तक शांति से बैठे रहते हैं। इनके संस्थापकों को इस अवधि में न तो जाति के उत्थान की याद आती है और न ही उनकी सियासी भागीदारी को लेकर किसी तरह के कार्यक्रम के आयोजन को लेकर ही ये सक्रिय होते हैं। अलबत्ता इनकी सक्रियता सिर्फ चुनावी साल में ही देखने को मिलती है। जातीय गोलबंदी करने के नाम पर राजनीतिक दलों का संचालन करने वाले ये लोग जाति के अधिकार और सम्मान के बजाय चुनाव के समय भी सिर्फ सीटों की सौदेबाजी के लिए ही सक्रियता दिखाते हैं।