ईद के मौके पर शिवपाल ने ट्वीट के जरिए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर हमला बोला था। उन्होंने लिखा था कि अपने सम्मान के न्यूनतम बिंदु पर जाकर मैंने उसे संतुष्ट करने का प्रयास किया। इसके बावजूद अगर नाराज हूं तो किस स्तर तक उसने हृदय को चोट दी होगी। हमने उसे चलना सिखाया और वो हमें रौंदता चला गया...।
इस भावनात्मक टिप्पणी पर बुधवार को शिवपाल ने कहा कि हमने परिवार व समाज की भलाई के लिए अपनी पार्टी खत्म करने से भी गुरेज नहीं किया। चाहते थे कि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनें लेकिन अहंकार उन्हें ले डूबा। चुनाव में किसी भी मुद्दे पर राय तक नहीं ली गई। हर कदम पर सम्मान से समझौता किया पर अब मुश्किल हो रहा है। इसलिए पार्टी को फिर से खड़ा कर रहे हैं। उन्होंने दोहराया कि उनके जो भी साथी इधर-उधर हैं, वे जल्द ही उनके साथ खड़े नजर आएंगे। सभी से बातचीत हो रही है।
विधानसभा चुनाव के बाद बढ़ी शिवपाल की नाराजगी
विधानसभा चुनाव के दौरान प्रसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से शिवपाल सिंह ने इस्तफा दे दिया था। वह पार्टी का सपा में विलय करना चाहते थे। वह खुद सपा के टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन उनके साथियों को टिकट नहीं मिला। सपा से विधायक चुने जाने के बाद भी उन्हें विधायक दल की बैठक में नहीं बुलाया गया। यहीं से जुबानी जंग शुरू हुई। भाजपा में जाने की चर्चा शुरू हुई तो अखिलेश ने टिप्पणी की। इस पर शिवपाल ने दो टूक कह दिया कि सपा अध्यक्ष चाहें तो उन्हें विधायक दल से निकाल दें।
प्रदेश की राजनीति पर नजर रखने वालों का कहना है कि प्रसपा जितनी मजबूत होगी, सपा को उतना तगड़ा झटका लगेगा। खासतौर से आलू बेल्ट में शिवपाल की पकड़ मजबूत मानी जाती है। आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, एटा, कासगंज फर्रुखाबाद, कन्नौज व आसपास के जिलों में शिवपाल की धाक है।
वर्ष 2017 में जब शिवपाल ने अखिलेश पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ी तो इस क्षेत्र में असर दिखा। वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन को 65 सीटें मिली तो सपा सिर्फ पांच पर सिमट गई। जानकारों का कहना है कि शिवपाल सिंह संगठन के माहिर खिलाड़ी है। सामाजिक परिवर्तन यात्रा के दौरान भी उन्होंने अपना असर दिखाया था। अब चुनाव बाद सपा की कार्यशैली पर सवाल उठाने वाले नेताओं को प्रसपा के बहाने एक विकल्प मिलेगा।
प्रदेश की राजनीति में तीसरे मोर्चे को मिलेगी ताकत
प्रसपा की सक्रियता बढ़ने से प्रदेश की राजनीति में तीसरे मोर्चे को भी ताकत मिलेगी। जेल से बाहर आने के बाद आजम खां नई पार्टी बनाते हैं या नई रणनीति अपनाते हैं, यह गौर करने वाली बात होगी। राजनीति विश्लेषकों का यह भी मानना है कि आजम खां के बहाने सपा पर निशाना साधने वाले ज्यादातर लोग शिवपाल की छतरी के नीचे गोलबंद हो सकते हैं।