रजत जयंती समारोह के बाद समाजवादी पार्टी महागठबंधन पर नफा-नुकसान के आकलन में जुटी है। समारोह में जनता परिवार के दिग्गजों के जमावड़े बाद इस पर अटकलें और तेज हो गईं हैं।
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यह दीगर बात है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ऐसे गठजोड़ से इत्तेफाक नहीं रखते लेकिन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव 2014 के आम चुनावों के नतीजों से सबक लेते हुए गैरभाजपा वोटों में किसी तरह का बिखराव नहीं चाहते।
इन अटकलों को इससे भी बल मिलता है कि कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर से दो दिन में उनकी दो मुलाकातें हुईं। रविवार को उनकी जदयू नेता शरद यादव से भी गुफ्तगू हुई। इसके बाद शरद यादव सीएम से मिले।
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मुस्लिम वोटों के लिए सपा पहले ही कौमी एकता दल का विलय करा चुकी है। अब भाजपा विरोधी दलों से गठजोड़ की कवायद जारी है। जनता परिवार के दिग्गज महागठबंधन के लिए सपा मुखिया के ओर देख रहे हैं। पिछले दिनों शरद यादव ने सोनिया गांधी से भेंट की थी।
उसके बाद कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद शरद से मिले थे। अब प्रशांत किशोर की सपा मुखिया से मुलाकातों को सियासी गठजोड़ के नजरिए से देखा जा रहा है।
हालांकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ऐेसे गठबंधन को सिरे से नकार रहे हैं। वे तो यहां तक कहते हैं कि प्रशांत किशोर कांग्रेस के रणनीतिकार नहीं महज सलाहकार हैं।
यूपी में झटका लगा तो तीसरे मोर्चे में घटेगा कद
मुलायम सिंह यादव
- फोटो : amar ujala
मुलायम सिंह दो-तीन बार कह चुके हैं कि इस बार भाजपा सत्ता में आई तो फिर उसे हटाने में वक्त लगेगा। इसके लिए वे गठबंधन की जरूरत को महसूस कर रहे हैं। वह भाजपा विरोधी मतों की लामबंदी चाहते हैं। प्रशांत किशोर, शरद यादव, अजित से उनकी बैठकें हो चुकी हैं।
विधानसभा चुनाव से पहले दोस्ती की चाहत छिपी हुई है। कई बड़े नेताओं को अपने मंच पर बुलाना, उनकी ओर से गठबंधन का प्रस्ताव दिखा रहा है कि इस मुद्दे पर मुलायम भी गंभीर हैं। शिवपाल पहले ही इन नेताओं से मिल चुके हैं।
गठबंधन के पैरोकार सपा नेताओं का मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा की संभावनाओं को जिंदा रखने के लिए अगले साल का विधानसभा चुनाव जीतना जरूरी है।
यदि यूपी में झटका लगा तो राष्ट्रीय स्तर पर सपा की स्वीकार्यता कम होगी और थर्ड फ्रंट में मुलायम का कद घट जाएगा। अभी जो नेता मुलायम सिंह से गठबंधन की अगुवाई करने की अपील कर रहे हैं, वे ही किनारा करने लगेंगे।
मुलायम, अखिलेश की चुप्पी
गठबंधन के प्रति सपा का रुख साफ न होने की प्रमुख वजह सीटों को लेकर फंसने वाला पेंच भी है। यदि महागठबंधन बनता है और उसमें रालोद, जदयू और कांग्रेस शामिल होंगे तो जाहिर है कि सीटों के लिए मारा-मारी होगी। सपा को बड़ा दिल करके उन्हें समायोजित करना होगा। एक-एक सीट के लिए जोड़तोड़ होगी, जो बेहद पेचीदा काम होगा।
सपा मुखिया भले ही गठबंधन की संभावना को लेकर दूसरे दलों के नेताओं से संपर्क में हों, लेकिन रजत जयंती समारोह में उन्होंने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। देवेगौड़ा, शरद यादव, अजित सिंह और लालू प्रसाद यादव ने गठबंधन का मुद्दा तो उठाया पर मुलायम ने संकेतों में भी इसका जिक्र नहीं किया।
शिवपाल जरूर गठबंधन को लेकर बोले, लेकिन सीएम अखिलेश भी इस मसले पर बोलने से बचते रहे। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श के बाद ही सपा की तरफ से कोई कदम बढ़ाया जाएगा।