वयस्कों होने वाली थायरॉयड की बीमारियां बच्चों में भी मिलने लगी हैं। ये दिक्कत उन्हें अपने परिवार से अनुवांशिक तौर पर मिलती हैं। अगर किसी बच्चे को हाइपोथायरॉयडिज्म है तो हो सकता है कि उसमें जन्मजात थायरॉयड ग्रंथि न बनी हो या फिर अर्द्धविकसित हो। ये भी हो सकता है कि ग्रंथि पूरी बनने के बाद भी सही मात्रा में हार्मोन न बना रही हो। इससे बच्चे का शारीरिक-मानसिक विकास धीमा होता है।
अपोलो अस्पताल के इंडोक्राइन विशेषज्ञ डॉ. एसके वंगानू ने बताया कि बच्चों में थायरॉयड के असंतुलन के कारण होने वाली दिक्कतें वयस्कों की तरह होती हैं लेकिन उनका इलाज कुछ अलग होता है। कुछ बच्चों के स्वभाव में परिवर्तन, स्कूल में पढ़ाई व अन्य क्रिया-कलापों में कमी आना, पेट में दर्द की शिकायत करना मुख्य है।
इसके अलावा अधिक नींद आना और थायरॉयड ग्रंथि बढ़ना भी इसके लक्षण हैं। डॉ. वंगानू ने बताया कि हार्मोन की कमी से फिजिकल व सेक्सुअल विकास प्रभावित होता है। बच्चे समय से पहले युवा दिखने लगते हैं। वजन भी बढ़ जाता है। ये दिक्कतें दिखें तो रक्त में टीएसएच व टी4 जांच से हाइपोथायरॉयडिज्म (थायरॉयड ग्रंथि से हार्मोन का कम स्राव) का पता लगाया जा सकता है। इसके अलावा बच्चे के हाथ-कलाई और नवजात में घुटनों की जांच से हड्डियों के धीमे विकास का पता लगाया जा सकता है।
गर्भावस्था में जरूर कराएं जांच
पीजीआई के इंडोक्राइन विभाग के प्रो. सुशील गुप्ता ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान शरीर में थायरॉयड के स्तर की जांच करते रहना जरूरी है। इसके असंतुलन से महिला को गर्भपात या फिर जन्म लेने वाले बच्चे मानसिक या शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। जन्मजात थायरॉयड की कमी में शिशु का स्वास्थ्य और बौद्धिक विकास प्रभावित होता है।
उन्होंने बताया कि हाइपोथायरॉयडिज्म ज्यादा पाई जाती है। 10 फीसदी जनसंख्या इसकी चपेट में है। 40-45 की उम्र में एक बार थायरॉयड की जांच जरूरी है।
पीजीआई पहुंचने वाले मरीजों में से 40 से 50 फीसदी थायरॉयड की कमी से पीड़ित होते हैं। प्रो. सुशील गुप्ता ने बताया कि वजन तेजी से बढ़ रहा हो या गिर रहा हो, हर व्यक्ति इसे थायरॉयड की बीमारी ही बताता है। मरीज इन्हीं भ्रांतियों के कारण अपने आप ही थायरॉयड की जांच कराने पैथोलॉजी पहुंच जाते हैं और सैकड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं।
जबकि सामान्य से अधिक और 10 से कम पाए जाने पर किसी भी मरीज को दवा देने की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए बिना विशेषज्ञ की सलाह के न तो थायरॉयड की जांच करानी चाहिए और न ही दवा लेनी चाहिए। सबसे बड़ी भ्रांति वजन बढ़ने को लेकर है। जबकि थायरॉयड की कमी से शरीर का वजन बहुत अधिक नहीं बढ़ता है। सिर्फ पांच से सात किलो ही वजन का फर्क पड़ता है।
आपको नंपुसक बना सकती है ये गंभीर बीमारी
शरीर का वजन तेजी से गिर रहा हो, घेंघा, गर्भावस्था में दिक्कत, बांझपन या नपुंसकता हो, बच्चों में शारीरिक वृद्धि न हो, शरीर में सूजन हो तो थायरॉयड की जांच कराना चाहिए। बिना वजह टी3, टी4 और टीएसएच जांच कराकर पैसा खर्च करने में समझदारी नहीं है।
थायरॉयड की कमी के लक्षण
वजन बढ़ना, मांसपेशियों में दर्द, त्वचा का सूखना और खुजली, नसें खराब होने के कारण पैर में झनझनाहट, ठंड लगना, ब्लड प्रेशर बढ़ना और नब्ज कम मिलना।
बढ़ने के लक्षण
दिल की धड़कन बढ़ना, भूख अधिक लगना, हाथों में कंपकंपी, पसीना अधिक आना, उभरी हुई आंखें, मांसपेशियों का कमजोर होना
इसका रखें ध्यान
गले में गांठ (घेंघा) हो तो जांच जरूर कराएं
गांठ की बायोप्सी भी जरूरी है
थायरॉयड कैंसर का इलाज संभव है