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प्रथम विश्व युद्ध में शहीद सैनिक की 103 साल की बेटी को मिला इंसाफ

Fri, 15 Apr 2016 03:00 AM IST
मनोज कुमार सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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हक की जंग जीतने की यह कहानी है नेपाल की 103 साल की सीरी कुमारी गुरंग की। 100 साल पहले उनके सैनिक पिता आरएफएन नैना गुरंग प्रथम विश्वयुद्ध में तत्कालीन ब्रिटिश शासन के अधीन देश की तरफ से लड़ते हुए शहीद हो गए थे।
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पिता की मौत के बाद सीरी को आजीवन फैमिली पेंशन मंजूर हुई। बाद में सीरी ने एक सैनिक से शादी कर ली। 1964 पति की मौत के बाद सीरी को साधारण फैमिली पेंशन मिलने लगने लगी।

2007 में अचानक नियमों का हवाला देकर उनकी पिता की मौत पर मिल रहीं पेंशन रोक दी गई। इसके बाद उससे 1.17 लाख रुपये भी वसूले गए। इस फैसले के खिलाफ उसने सशस्त्र सैन्य बल अधिकरण से गुहार लगाई। आखिरकार उसकी जीत हुई।
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अधिकरण के न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और प्रशासनिक सदस्य एयरमार्शल अनिल चोपड़ा की खंडपीठ ने उसकी पेंशन रोकने संबंधी आदेश को रद्द कर दिया साथ ही पक्षकारों भारत सरकार व अन्य संबंधित  सैन्य अफसरों पर एक लाख रुपये का हर्जाना भी लगाया है, जो याची सीरी को मिलेगी।

10 फीसदी ब्याज के साथ वापस करने का आदेश

इसके अलावा 2007 से पेंशन बंद किए जाने के बाद महिला से जो रकम वसूली गई थी, उसे 10 फीसदी सालाना ब्याज के साथ वापस करने का आदेश भी दिया है।

अधिकरण ने उसके पारिवारिक पेंशन को जारी रखने समेत 4 माह में पेंशन के एरियर का भुगतान करने का भी निर्देश दिया है।

अधिकरण ने पक्षकारों को यह छूट भी दी कि याची को दी जाने वाली हर्जाने की रकम को पेंशन रोकने केजिम्मेदार लोगों से जांच के बाद उनके वेतन से वसूली की जा सकती है।

पेंशन के खिलाफ दलील : शादी के बाद पिता की पेंशन की हकदार नहीं
प्रतिपक्षी पक्षकारों ने दलील दी कि जैसे ही याची महिला ने शादी की थी, उसी समय से वह पिता की मौत पर मिलने वाली पेंशन की हकदार नहीं रह गई थी। इसी आधार पर 2007 में पेंशन मामले संबंधी इलाहाबाद के प्रमुख नियंत्रक ने पेंशन रोक दी थी।
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अधिकरण ने कहा- तब शहीद के परिवारीजन को आजीवन पेंशन का नियम था

- फोटो : demo photo
अधिकरण ने इलाहाबाद के प्रमुख नियंत्रक के पत्रों समेत 28 जून 1990 के एक अन्य पत्र के हवाले से कहा कि प्रथम विश्वयुद्ध में शहीद सैन्य कर्मियों की पत्नी, माता-पिता अथवा बच्चों के आजीवन पेंशन किए जाने की व्यवस्था थी।

जबकि द्वितीय विश्वयुद्ध में मृत सैन्यकर्मियों की पुत्री को उसकी शादी तक ही पेंशन देने का प्रावधान था। ऐसे में याची को पिता की मौत पर मिल रही पेंशन को रोकने संबंधी प्रमुख नियंत्रक की राय गलत और 28 जून 1990 केपत्र के खिलाफ थी।
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