आखिरकार सपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने सेकुलर मोर्चा के गठन का ऐलान कर ही दिया। शिवपाल ने शुक्रवार को इटावा में सपा संरक्षक मुलायम सिंह से बंद कमरे में आधे घंटे तक बातचीत के बाद इसकी घोषणा की।
विज्ञापन
कहा, नेताजी के सम्मान की खातिर नए मोर्चे का गठन होने जा रहा है। मलायम सिंह इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे। शिवपाल के ऐलान के साथ ही सपा का टूटना तय हो गया है।
शिवपाल ने कहा कि सेकुलर मोर्चे के गठन की रूपरेखा जल्द ही तैयार की जाएगी। हम सब समाजवादी, लोहियावादी मिलकर लखनऊ में बैठेंगे। देश और प्रदेश के सेकुलर नेताओं को बातचीत कर उनको मोर्चे में आने का न्योता दिया जाएगा। इसी के साथ सात माह से चल रही उठापटक और विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद समाजवादी पार्टी आखिरकार टूटने के कगार पर पहुंच ही गई।
विज्ञापन
समाजवादी पार्टी की स्थापना 1992 में हुई थी। स्थापना के 25वें साल में सपा को भारी उठापटक का सामना करना पड़ा।
इस तरह हुई सपा में विवाद की शुरूआत
अखिलेश, मुलायम व शिवपाल
- फोटो : amar ujala
यूं तो 13 सितंबर 2016 को अखिलेश यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर शिवपाल सिंह यादव को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से ही सपा में विवाद की शुरुआत हो गई थी, लेकिन एक जनवरी 2017 को तब यह निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया जब सपा के विशेष अधिवेशन में मुलायम सिंह को हटाकर अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया।
इसी सम्मेलन में शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। मंत्री पद से तो उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपे जाने के बाद ही बर्खास्त कर दिया गया था। दोनों के समर्थक कई दिनों तक आमने-सामने रहे।
विधानसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले सपा अंदरूनी कलह से जूझ रही थी। सपा के सिम्बल (साइकिल) का विवाद निर्वाचन आयोग तक पहुंचा। इसमें जीत अखिलेश की हुई। निर्वाचन आयोग ने उन्हें सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष मानते हुए साइकिल सिम्बल दे दिया।
नेताजी की सम्मान वापसी के लिए मोर्चा
शिवपाल ने शुक्रवार को कहा कि नेताजी (मुलायम) का सम्मान वापस दिलाने और समाजवादियों को एक साथ लाने के लिए सेकुलर मोर्चा बनाया जा रहा है। अखिलेश यादव ने चुनाव से पहले कहा था कि तीन माह बाद नेताजी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद सौंप देंगे। उन्हें यह घोषणा किए हुए पांच महीने बीत चुके हैं, लेकिन वे अध्यक्ष पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इसीलिए नेताजी के नेतृत्व में सेकुलर मोर्चे का गठन किया जाएगा, इसकी जल्द घोषणा होगी।
मुलायम ने दिए थे संकेत, चुप नहीं बैठेंगे
मुलायम ने तीन दिन पहले ही ‘अमर उजाला’ से बातचीत में संकेत दिए थे कि मौजूदा हालात में वह चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने बड़े संघर्ष से पार्टी बनाई है। वह विचार कर रहे हैं कि क्या करना है? शीघ्र ही जनता के बीच निकलेंगे। मंडलवार कार्यक्रम तय करेंगे।
यदि सेकुलर मोर्चा की अगुवाई मुलायम करेंगे तो इससे अखिलेश की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। मुलायम ने जिस तरह तीन दिन पहले सपा की हार के लिए घमंड, चापलूसी और झूठी तारीफों को जिम्मेदार ठहराया, उससे अखिलेश पर अंगुली उठी है।
जनता के बीच जाकर मुलायम ने अखिलेश पर निशाना साधा तो सपाई दुविधा की स्थिति में आ सकते हैं। सपा के परंपरागत वोट बैंक में मुलायम के प्रति सम्मान है और वे अखिलेश को उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर देखते हैं। सेकुलर फ्रंट बनने पर सपा के बहुत सारे नेता मुलायम के साथ जा सकते हैं।
सपा में अखिलेश के नेतृत्व पर भी सवाल भी उठ सकते हैं। हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी है लेकिन सवाल यह भी उठेगा कि सेकुलर फ्रंट बना तो क्या पिता-पुत्र (मुलायम-अखिलेश) आमने-सामने होंगे।
बेटे के प्रति नरम रहा है मुलायम का रुख
- फोटो : amar ujala
मुलायम का परिवार देश का सबसे बड़ा राजनीतिक परिवार रहा है। मुलायम परिवार को साधने में माहिर माने जाते हैं लेकिन पिछले कुछ महीनों पहले शुरू हुए विवाद में उन्हें भी पार्टी मान लिया गया। अभी तक मुलायम, परिवार में सुलह की संभावनाएं देखते रहे हैं।
अखिलेश के प्रति उनका रुख नरम रहा है। वह पीड़ा जाहिर करते रहे हैं कि रामगोपाल यादव, अखिलेश का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। मुलायम ने अखिलेश को सीधे तौर पर निशाने पर नहीं लिया है।
विधानसभा चुनाव हारने के बाद मुलायम ही पहले नेता थे जिन्होंने कहा कि हार-जीत सामूहिक जिम्मेदारी होती है। हार के लिए अखिलेश अकेले जिम्मेदार नहीं हैं। सिम्बल का विवाद जब निर्वाचन आयोग पहुंचा तब भी मुलायम सिंह का रुख नरम ही माना जाता रहा।
इसीलिए चुनाव से पहले सवाल उठते रहे कि मुलायम परिवार का विवाद सुनियोजित ड्रामे की स्क्रिप्ट तो नहीं है, मगर अब सेकुलर फ्रंट के गठन से जाहिर हो रहा है कि परिवार के बीच गंभीर विवाद है।
एक जनवरी 2017 को मुलायम सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाए जाने का सीधा असर विधानसभा चुनाव पर पड़ा। मुलायम तीन सीटों को छोड़कर कहीं भी प्रचार के लिए नहीं गए। उन्होंने कांग्रेस से गठबंधन पर विरोध जताया।
शिवपाल भी केवल जसवंतनगर सीट तक सीमित रहे। सपा का विवाद इतना मुखर हुआ कि कन्नौज की सभा में पीएम नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को हवा दी।
यहां तक कहा कि अखिलेश ने उस कांग्रेस से गठबंधन किया है जो उनके पिता मुलायम सिंह की हत्या का प्रयास कर चुकी है। जो अपने पिता का नहीं है, वह किसी का नहीं हो सकता। शिवपाल ने चुनाव के दौरान ही पार्टी में सम्मान न मिलने पर अलग सियासी रास्ते के संकेत दे दिए थे।