होली फिर आ गई। लोग तैयारियों में जुटे हैं, पर सूबे की सियासी पिचकारियां इस होली की नहीं, बल्कि अगली होली में लोगों पर रंग जमाने की चिंता में जुटी दिख रही हैं। ऐसे रंग जुटाए जा रहे हैं जिनसे वोटर पर सबसे गहरा रंग जमाया जा सके। रंग ऐसा जिस पर विरोधियों के सारे साबुन बेअसर साबित हों।
अखिलेश की यूथ ब्रिगेड का ऐसा रंग जमा कि कई की रंगत उतर गई। कई बेचारे ऐसे हैं जिनकी होली ‘बेरंग’ थी तो कई इस उम्मीद में हैं कि कम से कम अगली होली तो रंगारंग हो जाए। राजनीति में होली के रंग अखिलेश वाजपेयी की कलम से-
सत्तासीनों को जनता के ‘रंग-ढंग’ की चिंता सताने लगी है तो सत्ता की बाट जोह रहे सियासी हुरियारे ऐसा गणित सेट करने में जुटे हैं कि बाकी का रंग फीका पड़ जाए। वे फाग का ऐसा राग छेड़ना चाहते हैं जिससे उनके ही राग में जनता मस्त दिखे।
साइकिल चला-चलाकर सत्ता तक पहुंचने वाले ‘चाचाओं’ ने पिछली होली से इस होली तक काफी सबक सीख लिया। शायद इसीलिए उन्होंने अपनी ‘रंगबाजी’ कम करके मौजूदा ‘रंग’ के साथ चलने का ‘ढंग’ सीख लिया है।
बलिया वाले चाचा लालबत्ती छिनने की चिंता छिपाए हुए चेहरे पर विनम्रता का ‘रंग’ पोतकर भतीजे को अपने रंग में रंगने की कोशिश में जुटे हैं, ताकि अगली होली में ‘रंगबाजी’ का मौका मिल जाए।
भतीजा हुआ 'रंगप्रूफ' तो 'महबूब' भी बदला-बदला दिखा
अलबत्ता, चचा जान पिछली होली की तरह इस होली में भी उछल-कूद का रंग बिखेर रहे हैं। भतीजे की रंगभरी पिचकारी की धार की तेजी से कभी-कभी ‘चचा जान’ आहत से दिखते रहे। कोपभवन पहुंचे। वहां से भी ‘रंग’ बरसाने की कोशिश की, लेकिन भतीजा तो मानो ‘रंगप्रूफ’ हो चुका है, कोई रंग चढ़ा ही नहीं। ऊपर से ‘महबूब’ का रंग भी बदला-बदला दिखा।
अब मगजमारी करने को मजबूर हैं कि न जाने भतीजे पर किसका रंग चढ़ गया है कि उसका ढंग भी बदला-बदला सा है। सियासी दुनिया में आगे भी भतीजे की ही रंगबाजी बरकरार रहने की चिंता ने ‘चचा जान’ की होली का ‘रंग’ फीका कर दिया है। पर, चचा भी कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं।
अपना रंग फीका होता देखकर उन्होंने विधानसभा के भीतर राजभवन पर जो रंग फेंकने की कोशिश की, उसकी कुछ छींटें उन पर भी पड़ीं, पर चचा शायद इसी से संतोष कर रहे होंगे कि उन पर पड़ने वाली ये छींटे कहीं न कहीं सरकार को भी रंग-बिरंगा करेंगी। इसी में उन्हें होली का अपना मजा दिख रहा है।
राजभवन वाले 'भाऊ' ने उड़ा दिया सरकार का रंग
सियासी दांवपेच में माहिर 80 वसंत देख चुके राजभवन वाले ‘भाऊ’ की पिचकारी से निकले रंगों ने इस बार भी सरकार की ‘रंगबाजी’ में खलल डाला। कभी विधेयकों को रोका तो कभी प्रोटोकॉल के ढंग पर जोरा-जोरी हुई।
लोकायुक्त मामले में तो सर्वोच्च न्यायालय में भी ‘भाऊ’ ने ऐसी पिचकारी भांजी कि सूबे की सरकार की रंगत उड़ी-उड़ी सी रही। मिश्राजी का रंग जम गया तो मेहरोत्राजी शायद ही इस मुई होली को कभी भूल पाएं।
वैसे इस होली पर बिहार से लेकर यूपी और किसानों वाली पार्टी के जाट भैया एक साथ हुरियारों की चौकड़ी जमाने की कोशिश में हैं, पर उन्हें चिंता इस होली की नहीं बल्कि अगली की है। पंजा वालों ने होली के रंग को बिरंगा करने के लिए जुगत भिड़ाया है तो 'हाथी' भी नीला रंग जमाने की चाल चल रहा है।
पूरी 'रंगबाजी' में हैं भगवा टोली के कप्तान
वहीं, भगवा टोली के मौजूदा सूबाई कप्तान शायद जान चुके हैं कि अगली होली का मजा कैसा रहेगा। इसलिए इस होली पर पूरी रंगबाजी में हैं।
वहीं, गुजराती से बनारसी हुए मोदी की रंगबाजी तो दुनियाभर में जम रही है, लेकिन बनारसी बाबुओं की चिंता तो सिर्फ यह है कि उनके एमपी की रंगबाजी ने उनका रंग उतार दिया है।
काशी को क्वेटो बनाने और उसे तीन लोक से न्यारी बनाने का सपना हर होली में अगली होली के इंतजार में आगे बढ़ जाता है। बेचारे भांग पीकर गंगा किनारे गाना गुनगुना कर गम गलत कर रहे हैं, ‘वादे हैं वादों का क्या..।’
अब देखना है किस सियासी हुरियारे का जनता पर कितना रंग चढ़ता है। अगली होली किसकी रंगारंग होती है और किसकी बेरंग। जनता किसके रंग में सराबोर होती है और किसकी पिचकारी फुस्स होती है। जिस चुनावी रंगरसिया का रंग चटख होगा, उसके साथ ही जनता की जुगलबंदी पक्की होगी।
किसी का राग नहीं मिल रहा है किसी से
भगवा पार्टी वाले भी अगली होली पर ही नजर गड़ाए हैं, लेकिन अभी तक कोई ऐसा आदमी नहीं मिल पाया है जिसे वह अपने हुरियारों की मंडली की अगुवाई सौंप सकें।
भगवा हुरियारों की टोली में सब कबीरा गा रहे हैं, हालांकि किसी का राग किसी से नहीं मिल रहा है। पर, वे बेचारे क्या करें जिनका रंग ऐसा बिखरा कि मजा ही किरकिरा हो गया।
सोचा तो था कि कमल वाली पार्टी की कप्तानी इस होली में कुछ ऐसा ‘रंग’ जमाएगी कि गुझिया की मिठास का मजा दोगुना हो जाएगा। पूरे सूबे में रंगबाजी जम जाएगी, पर दिल्ली वालों ने ऐसा रंग उतारा कि ‘होली’ का सारा मजा ही किरकिरा हो गया।
हाथी ने भरी पिचकारी- सब नीला करना है, पंजा बोला- हम भी हैं
हाथी भी चार साल से अपनी चाल चलते-चलते होली के रंग में रंगता दिख रहा है, पर चिंता यहां भी चाल में मस्ती कायम रखने की है। होली की मस्ती में हाथी के साथी फिर से पिचकारी भरने में जुट गए हैं, ताकि जनता को नीले रंग में रंगा जा सके।
वहीं, पंजा वाली पार्टी के हुरियारों की होली तो बस रस्म अदायगी है। ‘शालीनता’ की चादर ओढ़े, बेचारे मन ही मन सोच रहे हैं कि जाने कब रंग-बिरंगी होली खेलने का मौका मिलेगा। अब बिहार से चली फगुआ बयार से उम्मीदें बंधीं हैं।
मिस्त्री की पिचकारी फुस्स होती देख उन्होंने प्रशांत किशोर को तलाशा और होली रंगीन करने की कोशिश में जुट गए हैं। बात दीगर है कि उन्हें भी पता है, यूपी और बिहार में क्या फर्क है।