पिछड़ी और अति पिछड़ी जाति को लेकर सपा के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ भाजपा और बसपा ताल ठोंक रही है तो दूसरी तरफ अलग-अलग जाति के नए संगठन भी चुनाव मैदान में उतर रहे हैं।
ऐसे में सपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के जरिए इस आधार वोटबैंक को सहेजने में जुट गई है। अति पिछड़ी जातियों में केवट, मल्लाह, बिंद, लोहार, कुम्हार, कहार, माली, बियार, बारी आदि जातियां अलग-अलग सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं।
प्रदेश का जातीय गणित देखा जाए तो करीब 52 फीसदी वोटबैंक पिछड़ी जाति का माना जाता है। इसमें करीब 42 फीसदी गैर यादव वोटबैंक है। यह वोटबैंक समय के साथ अलग- अलग पार्टियों के साथ रहता रहा है।
इसी तरह करीब 16 जिले में करीब 12 फीसदी कुर्मी और 13 जिले में करीब 10 फीसदी मौर्य, कुशवाहा व शाक्य हैं। इसी तरह मध्य, पश्चिम और बुंदेलखंड को मिलाकर करीब 23 जिलों में पांच से 10 फीसदी लोध वोटबैंक, गंगा, यमुना, गोमती सहित विभिन्न नदियों के किनारे बसी आबादी में करीब छह फीसदी मल्लाह वोटबैंक माने जाते हैं।
इसके अलावा लोहार, कोहार, बियार व अन्य जातियां अलग-अलग पॉकेट में निर्णायक भूमिका में हैं। सियासत पर नजर रखने वालों का तर्क है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा पिछड़ा वर्ग को आकर्षित करने में कामयाब रही है। यही वजह है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सपा इस वर्ग को अपने साथ जोड़े रखने को लेकर चौकन्नी हो गई है।