वैसे तो बसपा को छोड़कर किसी पार्टी ने राजधानी की सभी सीटों के लिए अभी उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। भाजपा ने नौ में सात सीटों के उम्मीदवार घोषित किए हैं तो सपा ने सिर्फ चार उम्मीदवारों के नामों की ही घोषणा की है।
पर, शहर की पांचो सीटों के प्रत्याशी घोषित हो जाने से भावी सियासी परिदृश्य का संकेत जरूर मिलने लगा है। इन सीटों पर सपा के सामने साख बचाने तो भाजपा के सामने खोई प्रतिष्ठा लौटाने की चुनौती है।
बसपा की बात करें तो उसके लिए यहां इस बार खोने के लिए कुछ भी नहीं है। कॉंग्रेस ने अभी किसी उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। बंटवारे में उसे यहां कितनी सीटें मिलेंगी यह भी साफ नहीं हो पाया है।
इसलिए फिलहाल वह दर्शक की ही भूमिका में दिखाई दे रही है।दरअसल, 2012 के पहले लखनऊ की पांच शहरी सीटें एक तरह से भाजपा का गढ़ जैसी मानी जाने लगी थी। इन सीटों में दो लखनऊ पश्चिम व मध्य पर तो 1989 से 2012 चुनाव के पहले तक भाजपा का कब्जा रहा।
शेष तीन सीटों पूरब, मध्य व कैंट पर 1991 से 2012 के पहले तक भाजपा जीतती रही थी। पर, विधानसभा के पिछले चुनाव में उसे इन सीटों में एक को छोड़कर सभी पर पराजय का सामना करना पड़ा।
मध्य से सपा के रविदास मेहरोत्रा, पश्चिम से सपा के ही रेहान और उत्तर से इसी पार्टी के अभिषेक मिश्र विजयी रहे थे। कैंट से रीता बहुगुणा जोशी कॉंग्रेस के टिकट पर जीती थी तो पूरब सीट से भाजपा के टिकट पर कलराज मिश्र ने सफलता पाई थी। ग्रामीण इलाके की मोहनलालगंज, सरोजनीनगर, मलिहाबाद और बख्शी का तालाब सीट भी सपा के ही हिस्से में गई थी।