शायर अहमद सलमान की इन पंक्तियों जैसे ही तेवर हैं चुनावी समर में ताल ठोक रहे बागियों के। टिकट क्या कटा, बागी हो गए। हर मंच पर अपने जख्म दिखा रहे हैं। कुर्बानियों का बखान कर रहे हैं। शोले उगल रहे हैं। सियासी इंतकाम लेने की कसमें खा रहे हैं। अपना खेल बने या न बने, खेल बिगाड़ेंगे जरूर। हालांकि, यह कोई नई बात नहीं। हर चुनाव में होता है। अतीत के आईने में झांकें तो प्रदेश में हर चुनाव में कई सीटें मिल जाएंगी जहां बागियों ने खेल बिगाड़ा। वर्ष 2017 के चुनाव में भाजपा व सपा को बागियों के चलते कई सीटें गंवानी पड़ी थीं। बागी बनकर चुनाव में उतरने वालों की वजह से बड़े दलों को कई सीटों पर मात खानी पड़ी थी। इस बार भी कई सीटों पर ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है।
सपा और भाजपा दोनों ने कई विधायकों का टिकट काटकर नए उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, तो कई सीटों पर सहयोगी दलों से समझौते की वजह से भी दावेदारों को टिकट नहीं दिए जा सके। इससे वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वाले तमाम नाराज कार्यकर्ता या तो दूसरे दलों से टिकट लेकर मैदान में उतर चुके हैं या निर्दल ही अपनी-अपनी पुरानी पार्टियों के उम्मीदवारों के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं। चूंकि अबकी मुख्य मुकाबला भाजपा व सपा के बीच दिखाई दे रहा है, इसलिए बागियों से सर्वाधिक खतरा इन दोनों दलों को ही होना है। पश्चिमी यूपी के कई जिलों में तो चुनाव संपन्न हो चुके हैं, लेकिन पश्चिम के बाकी जिलों के साथ ही मध्य यूपी, बुंदेलखंड, अवध और पूर्वांचल में बागियों की संख्या अधिक है। इसलिए कई सीटों पर इसका सीधा असर पड़ने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
भाजपा : टिकट कटने से भारी रोष
सत्ताधारी दल होने के बावजूद भाजपा को कई सीटों पर बागियों से कड़ी चुनौती मिल रही है। भाजपा ने पूर्वांचल में मुगलसराय, गोरखपुर सदर, बैरिया समेत कई सीटों पर मौजूदा विधायकों का टिकट काटकर नए चेहरे उतारे हैं। इसको लेकर टिकट कटने वालों और उनके समर्थकों में भारी असंतोष है। सियासी पंडितों का भी मानना है कि इन सबका साइड इफेक्ट दिखना तय है। बलिया के बैरिया सीट पर मौजूदा विधायक सुरेंद्र सिंह बागी होकर विकासशील इंसान पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल कर चुके हैं। सुरेंद्र सिंह की अपनी पकड़ है। ऐसे में भाजपा उम्मीदवार संसदीय कार्य राज्यमंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला को काफी चुनौती मिल सकती है। इसी तरह गोंडा के कैसरगंज सीट से टिकट नहीं मिलने से बागी हुए विनोद कुमार शुक्ला भाजपा छोड़ बसपा से ताल ठोक रहे हैं।
ऊंचाहार से टिकट के प्रबल दावेदार रहे अतुल सिंह भी कांग्रेस से मैदान में उतरकर भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। सिद्धार्थनगर की इटवा सीट से टिकट नहीं मिलने पर कई बार के विधायक रहे जिप्पी तिवारी खुद सामने आने के बजाय अपने भाई को बसपा से चुनाव लड़ा रहे हैं। ऐसे तमाम उदाहरण हैं, लेकिन सपा के मुकाबले भाजपा में एक बात अलग यह है कि टिकट कटने के बाद भी ज्यादातर विधायक या पुराने कार्यकर्ता मुखर होकर विरोध करते नहीं दिख रहे हैं।
सपा : कई सीटों पर बागी दिखा रहे तेवर
बागियों की सबसे अधिक संख्या समाजवादी पार्टी में है। तीसरे से लेकर सातवें चरण के चुनाव में बागियों का सबसे अधिक सामना सपा को ही करना पड़ेगा। कई सीटों पर तो उसे कड़ी चुनौती मिलने की भी बातें कही जा रही हैं। अयोध्या की रुदौली सीट को ही देख लीजिए। पूर्व विधायक अब्बास अली रुश्दी मियां सपा से इस्तीफा देकर बसपा के टिकट पर मैदान में हैं। वे सपा को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में हैं। इसी तरह अनूप सिंह बागी होकर बीकापुर के अखाड़े में निर्दलीय ताल ठोक रहे हैं। वह भी सपा के लिए चुनौती खड़ी करते दिख रहे हैं।
टांडा में शबाना खातून, मड़ियाहूं सीट पर पूर्व विधायक श्रद्धा यादव, महोबा सीट पर पूर्व विधायक सिद्ध गोपाल साहू के भाई संजय साहू, श्रावस्ती सीट पर पूर्व विधायक मो. रमजान, फाजिल नगर सीट पर सपा जिलाध्यक्ष इलियास अंसारी बसपा उम्मीदवार के तौर पर मैदान में आ चुके हैं। इसके अलावा भी सपा को कई सीटों पर पार्टी से नाराज पुराने कार्यकर्ताओं के भितरघात का सामना करना पड़ रहा है। फिरोजाबाद सदर सीट से टिकट नहीं मिलने से नाराज अजीम ने पत्नी साजिया हसन को मैदान उतार दिया है। शिकोहाबाद में सपा के पूर्व विधायक ओपी सिंह भाजपा प्रत्याशी के तौर पर सपा के सामने हैं। सपा से सात बार विधायक रहे नरेंद्र सिंह यादव इस बार फर्रुखाबाद की अमृतपुर सीट से निर्दलीय ताल ठोक रहे हैं। पूर्व विधायक अजय यादव भी हाथी पर सवार होकर एटा सीट से सपा के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं।
दल-बदल से भी बढ़ी बागियों की संख्या
भाजपा हो या सपा, दोनों ने इस बार जमकर दलबदल कराया। मंत्री होते हुए भी स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान जैसे बड़े ओबीसी चेहरे के अलावा छह से ज्यादा विधायकों ने भाजपा छोड़ साइकिल की सवारी कर ली। वहीं, एक दर्जन से अधिक पूर्व मंत्रियों और विधायकों ने सपा काे छोड़ा। वे भी भाजपा, कांग्रेस या बसपा का दामन थाम मैदान में उतर चुके हैं या अपने बेटे, पत्नी या फिर किसी समर्थक को उताकर अपनी पुरानी पार्टी के उम्मीदवार के लिए चुनौती खड़ा करते दिख रहे हैं।
भितरघातियों से भी है खतरा
खुलेआम बगावत करने वालों के अलावा दोनों दलों में ऐसे भितरघातियों की भी संख्या बहुतायत में है, जो पार्टी में उपेक्षा की वजह से आहत हैं और इस बार भी टिकट पाने से वंचित रह गए हैं। इनमें बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो करीब 25-30 साल से पार्टी के प्रति निष्ठा से काम करते रहे और जब बारी आई तो पार्टी ने दूसरे दलों से आए लोगों को टिकट देकर चुनाव मैदान में उतार दिया। ऐसे लोग भी भाजपा और सपा के अधिकृत प्रत्याशियों के लिए चुनौती बन सकते हैं। उधर दोनों दलों में टिकट कटने से आहत कई ऐसे विधायक भी हैं जो खुद तो अधिकृत प्रत्याशी के साथ घूमकर साथ होने का दिखावा कर रहे हैं, पर उनके समर्थकों का समर्थन पार्टी के प्रत्याशियों को नहीं मिल रहा है। ऐसे समर्थक क्षेत्र में निकलने के बजाय चुप्पी साधकर घर बैठ गए हैं।