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11 वजहें, फायरब्रांड नहीं रहे भाजपा के 'कल्याण'

Wed, 12 Mar 2014 10:48 AM IST
मनोज श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
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हिचकोले खातीं सड़कें... लुकाछिपी करती बिजली। सड़क, पानी बिजली के अलावा रेल सेवाओं का विस्तार न होना एटा की बड़ी समस्या है।
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सिर्फ एक पैसेंजर ट्रेन टूंडला से एटा आती है और लौट जाती है। बिल्कुल डग्गामार बस की तरह, जगह-जगह रुकते-रुकाते। लोग इन समस्याओं पर सवाल उठाते हैं? कहते हैं आखिर सांसद ने किया क्या?

इस सबके बीच सवाल उनकी क्षेत्र में मौजूदगी को लेकर भी उठते हैं, तो कुछ लोग उनकी संसद में मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाते हैं।

तुलसीदास के नाम पर भी हुई राजनीति

सोरों निवासी ज्योतिषाचार्य सुधांशु निर्भय बताते हैं कि 2012 में राज्य सरकार ने रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास की जन्मभूमि को विकसित करने के नाम पर 20 लाख रुपये राजापुर (गोंडा) को दिए थे।

इस पर सोरों के लोगों ने ऐतराज जताया और कहा कि असल जन्मभूमि सोरों में है। सारे साक्ष्य हैं। ...राज्य सरकार को गुमराह किया गया है।

सांसद कल्याण सिंह से भी निवेदन किया गया कि वे जनभावनाओं को उद्वेलित करने वाले इस मुद्दे को संसद में उठाएं और राज्य सरकार से भी बात करें।

उन्हें सोरों भी बुलाया गया, पर उन्होंने न संसद में मुद्दा उठाया और न ही राज्य सरकार से बातचीत की।

सोरों भी नहीं आए। सुधांशु कहते हैं कि सोरों के लोगों में रोष है, चुनाव में कल्याण सिंह वोट मांगने क्षेत्र में आए तो हम लोग पूछेंगे कि आखिर इस बेरुखी का सबब क्या था?

पांच साल में कल्याण ने नहीं ली सुध

अपने संसदीय क्षेत्र एटा में बेहद कम आने का सवाल सिर्फ ज्योतिषाचार्य सुधांशु निर्भय को ही नहीं सालता, आरटीआई एक्टिविस्ट प्रत्येंद्र पाल सिंह राजपूत हों या समाजसेविका डॉ. निरूपमा वर्मा या फिर कारोबारी अनुपम शर्मा।

सबको नाराजगी इस बात की है कि कल्याण सिंह ने पिछले पांच सालों में निर्वाचन क्षेत्र की सुध ही नहीं ली। समस्याओं का समाधान क्या करते?

पिछले 8-9 साल से रेल के लिए अभियान चलाने वाले लक्ष्य संस्था के सत्य प्रवीण गुप्ता कहते हैं कि हम लोगों के प्रयासों को कभी कल्याण सिंह या किसी अन्य सांसद ने तनिक भी सहयोग नहीं दिया, वरना बात बन जाती।

शायद इसी वजह से महज 30 किलोमीटर दूर कासगंज व्यापारिक व सामाजिक स्तर से एटा से कहीं आगे दिखता है। कारोबार व कारोबारी वहां से खिसके ही नहीं। बसावट भी कासगंज में एटा से ज्यादा है।

किसानों में नाराजगी

बदहाल सड़कों, आती-जाती बिजली, अपराध दर में बढ़ोतरी व किसानों की दुर्दशा का सवाल जब-तब लोगों को उद्वेलित करता है।

पर उससे न यहां की सियासत हिलती है और न ही जनता की मुट्ठियां भिंचती हैं।

कासगंज में हरी टोपी लगाए मिले भारतीय किसान यूनियन के नेता भगवान सिंह राघव बताते हैं कि पिछले चुनाव में हमने महेंद्र सिंह टिकैत के कहने पर कल्याण सिंह का समर्थन किया था और उम्मीदें संजोई थीं कि किसानों के सवाल पर वह हमारी आवाज को सुर देंगे, पर नाउम्मीदी हाथ लगी।

यूनियन के जिला सचिव मलखान सिंह पर झूठा केस दर्ज होने का मामला रहा हो या ओलावृष्टि व अन्य आपदाओं से बर्बाद फसल के कारण किसानों को मुआवजा मिलने का, कल्याण सिंह हमारे सवालों से मुंह फेरे रहे।

सक्रिय होते भी कैसे, क्षेत्र में उनकी उपलब्धता ही न के बराबर थी। हम इस चुनाव में तटस्थ रहेंगे।

तीन साल में तीन दिन रही लोकसभा में उपस्थिति

स्थानीय निवासी राकेश शर्मा कहते हैं कि सड़कों का हाल बुरा है, पर कोई सांसद उनको ठीक कराने में दिलचस्पी तभी लेगा जब उसने खुद उन सड़कों पर हिचकोले खाए हों।

आरटीआई एक्टिविस्ट प्रत्येंद्र पाल सिंह राजपूत कहते हैं कि क्षेत्र में ही नहीं लोकसभा में भी वह कभी-कभार दिखते थे। ... तो विकास कैसे होता।

बताते हैं कि 2012 में उन्होंने सूचना के अधिकार के जरिये कल्याण सिंह की लोकसभा में उपस्थिति और पूछे गए सवालों के बारे में जानकारी मांगी थी।

जवाब मिला था कि सिर्फ तीन दिन उपस्थिति रही। प्रश्नकाल में एटा से जुड़ा कोई सवाल पूछा ही नहीं गया। क्या ऐसे में कल्याण सिंह को जिम्मेदार सांसद कहा जा सकता है?

विकास किसी दल के एजेंडे में ही नहीं

समाज सेविका डॉ. निरूपमा वर्मा कहती हैं कि एटा का दुर्भाग्य रहा कि पिछले 25 सालों में किसी दल ने चुनाव में यहां विकास को एजेंडा नहीं बनाया।

जनता ने सांसद से नहीं पूछा कि उसने क्षेत्र का क्या विकास किया। नतीजा, एटा आज भी वहीं है, जहां 25 साल पहले था। जहां तक कल्याण सिंह की बात है, बड़े नेता हैं, लोगों को उम्मीदें थीं।

पर निराश किया। एक भी विकास की परियोजना नहीं जिसे कल्याण सिंह कह सकें कि वह उनके प्रयासों का प्रतिफल है। विकास तो दूर वह अपने क्षेत्र का हालचाल लेने तक बहुत कम आए। सांसद निधि का ठीक से इस्तेमाल तो किया नहीं।

मैंने क्षेत्र में उनकी गैरहाजिरी को लेकर 2011 में फेसबुक पर लापता सांसद के नाम से एक पोस्ट की थी, उसे अप्रत्याशित रूप से लोगों ने पसंद किया।

जैसा माहौल बना है उससे यही लगता है कि हर बार की तरह इस बार भी जाति का सवाल ही प्रमुख हो जाएगा और बदलाव के कोई नए अंकुर नहीं फूटेंगे।

कल्याण बताएं बिरादरी से लिया कितना, दिया क्या

अपराध निरोधक समिति के सदस्य प्रत्येंद्र पाल सिंह राजपूत कहते हैं कि बेशक कल्याण सिंह बड़े राजनेता हैं और लोधी बिरादरी में उनका बहुत आदर है।

एटा में लोधी मतदाता भी बहुत हैं जिनका चुनावी राजनीति में निर्णायक महत्व है, पर कल्याण सिंह को बताना चाहिए जिस लोध समाज ने एक स्कूल मास्टर को राजनीति के शिखर तक पहुंचाया, उसको उन्होंने क्या दिया?

एटा की किस समस्या में दिलचस्पी दिखाई और उसके समाधान के लिए क्या किया? जीते-हारे चाहे जो, पर इस चुनाव में कल्याण सिंह से भी सवाल होंगे और उन्हें जवाब देना ही होगा।

बिरादरी को दिलाई पहचान

सांसद प्रतिनिधि वीरेंद्र सिंह लोधी का कहना है कि बाबूजी ने बिरादरी को राजनीतिक सम्मान और पहचान दिलाई।

वह चाहे जिस दल में रहे हों, बिरादरी चट्टान की तरह उनके साथ खड़ी रही है। पिछली बार सपा के समर्थन के कारण यादव हमारे साथ थे बाकी तमाम जातियां नाराज।

पर इस बार केवल यादव दूर हैं जबकि ठाकुर, ब्राह्मण, अति पिछड़े साथ। लोध समाज और बाबूजी के लिए भाजपा अपनी नेचुरल पार्टी है, इसलिए नतीजे पिछली बार की तुलना में बेहतर होंगे।

जहां तक विकास की बात है, विरोधी दल के सांसदों की अपनी सीमाएं होती हैं, फिर भी उन्होंने अपनी सांसद निधि का ठीक ढंग से इस्तेमाल कराया है।

नाराजगियों पर झाड़ू चलाती जाति

पर इन सारी नाराजगियों पर जाति झाड़ू चलाती नजर आती है।

लोधी महासभा से जुड़े अतर सिंह राजपूत कहते हैं कि प्रत्येंद्र पाल या कोई और बाबूजी (कल्याण्‍ा सिंह) के खिलाफ किसी लोधी बहुल गांव में जाकर बयानबाजी करें, तुरंत पता चला जाएगा कि लोध समाज के लिए वे क्या हैं।

बकौल राजपूत लोध न केवल बाबूजी के लिए वोट करेगा बल्कि कराएगा भी। गौरतलब है कि एटा संसदीय क्षेत्र में लोधी समाज के वोटर सवा दो लाख से ज्यादा हैं।

जाति फैक्टर रंग लाता रहा है

एटा में सपा ने दो बार सांसद रह चुके देवेंद्र यादव पर दांव खेला है तो बसपा ने नूर मोहम्मद को मैदान में उतारा है। पीडब्ल्यूडी में एक्सईएन रहे नूर रिटायरमेंट के बाद पहली दफा सियासत में भाग्य आजमा रहे हैं।

कांग्रेस की बात करें तो उसने महान दल से समझौता कर रखा है। उसने अभी अपना पत्ता नहीं खोला है। भाजपा ने भी कल्याण सिंह को अभी मैदान में उतारने की घोषणा नहीं की है।

ऐसे में पूरा चुनावी परिदृश्य साफ नहीं है। यहां जाति फैक्टर रंग लाता रहा है। यही वजह रही है कि दल लोध और यादव के साथ ही मुस्लिम, शाक्य, एससी-एसटी को साधने की जुगत भिड़ाते रहे हैं।
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ये रहे परिणाम

2009
कल्याण सिंह (निर्दलीय) 2,75,717, कुंवर देवेंद्र सिंह यादव (बसपा) 1,47,449, जीत का अंतर 1,28,268
2012
विधानसभा चुनाव में पांच सीटों में से चार पर सपा का कब्जा हुआ।
एटा-आशीष यादव (सपा)
मारहरा-अमित गौरव (सपा)
पटियाली- नजीबा खान जीनत (सपा)
अमांपुर-ममतेश (बसपा)
कासगंज मानपाल (सपा)
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