लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. एसके द्विवेदी का कहना है कि एकतरफा परिणाम के बारे में तो सटीक कारण नहीं बताया जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि लखनऊ का मतदाता पढ़ा-लिखा व विश्लेषक है। खासतौर पर शहरी मतदाता प्रत्याशियों व पार्टियों को अपनी कसौटी पर कसने के बाद वोट देता है। इधर, यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। बाकी पार्टियों की ओर से उठाए जाने वाले मुद्दों पर भी वह विचार करता है। ऐसे में परिणाम भी बदल रहे हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संजय गुप्ता का कहना है कि राजनीति में संयोग के लिए बहुत स्थान नहीं होता। मेरा मानना है कि 2012 तक सपा, बसपा के नेतृत्व में ही सरकार जनता तलाश रही थी। 2014 के बाद उसे भाजपा में भी संभावना दिखी। साथ ही 2007 में पांच वर्ष के लिए सरकार चुनी गई तो लोगों को उनके काम का मूल्यांकन करने का मौका मिला। 2012 में इसीलिए बदलाव हुआ और फिर 2017 में भाजपा की सरकार बनी। अब जनता सोच समझकर, काम के आधार पर नेता चुन रही है।