भाजपा एक बार फिर अतीत को दोहराती दिख रही है। पहले की तरह लोकसभा चुनाव की गूंज के साथ पार्टी के भीतर अटल की विरासत का झगड़ा सतह पर दिखने लगा है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने रविवार को यहां महारैली में जो कुछ जिन शब्दों और जिस शैली में कहा, उससे इस बात के संकेत साफ हो गए कि उनकी नजरें कहां टिकी हैं।
भले ही नरेंद्र मोदी भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो चुके हों, लेकिन राजनाथ ने अभी हार नहीं मानी है।
भाजपा के संकट मोचक माने जाने वाले राजनाथ अपनी राह के कांटों को निकालने की योजना में लग गए हैं।
महारैली में भाषणों के क्या हैं मायने
महारैली में जिस तरह पहले राजनाथ सिंह ने लखनऊ को लेकर अपने प्रेम का इजहार करते हुए कहा कि वह दुनिया में चाहे जहां रहें लेकिन लखनऊ के होकर रहेंगे।
उन्होंने इसी लखनऊ में तमाम रूपों में काम किया है। इससे साफ हो गया कि उनका इशारा किधर है। नरेंद्र मोदी भी पीछे नहीं रहे।
उन्होंने भी लखनऊ से जुड़ाव का उल्लेख करने में चूक नहीं की। अटल व लखनऊ को लेकर जितनी प्रशंसा हो सकती थी, की। इससे साफ है कि वाजपेयी की विरासत का महत्व भाजपा में कितना अहम है।
राजनाथ की कोशिश है कि वे लखनऊ से चुनाव लड़कर दिल्ली पहुंचें, जिससे उनके पास भी यह तर्क रहे कि वे अटल की विरासत को संभालने आए हैं।
उस अटल की विरासत वह संभाल रहे हैं, जिन्होंने विरोधी विचारधारा वाले दलों से तालमेल बनाकर एनडीए नेता के रूप में शासन संभाला।
राजनाथ ने बिछा दी हैं बिसात
राजनाथ ने शायद इसीलिए रामविलास पासवान, उदितराज जैसे कई चेहरों को अपने साथ जोड़ना शुरू कर दिया है।
जो लोकसभा में भाजपा की सीटों का आंकड़ा 272 से कम रहने पर धर्मनिरपेक्षता की दुहाई के साथ अटल के उत्तराधिकारी के रूप में प्रधानमंत्री पद के लिए राजनाथ की पैरोकारी कर सकें।
वैसे लखनऊ से सांसद व अटल के करीबी लालजी टंडन ने भी हार नहीं मानी है।
पिछले दिनों उन्होंने लखनऊ में कन्वेंशन सेंटर के लोकार्पण कार्यक्रम में लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी में ‘खुदा लखनऊ को लोगों की बुरी नजर से बचाए’ कहकर यह साफ कर दिया है कि आसानी से अपनी दावेदारी नहीं छोड़ेंगे।
ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है लखनऊ
लखनऊ का अपना अलग विशिष्ट इतिहास है। भले ही वाजपेयी के रूप में लोकसभा की इस सीट से भगवा टोली को पहली सफलता 1991 में मिली हो।
यह यह शहर तमाम ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह बनने के साथ संघ के राजनीतिक संगठन जनसंघ के प्रथम अधिवेशन का भी साक्षी रहा है।
संघ से इस शहर का सरोकार काफी पुराना रहा है। भले ही अटल बिहारी वाजपेयी की शिक्षा कानपुर में हुई हो, लेकिन संघ के कार्यकर्ता, पत्रकार व कवि के रूप में पहचान उन्हें इसी शहर से मिली।
भाजपा के लिए हमेशा अहम रहा है लखनऊ
संघ की लखनऊ में विशेष सक्रियता का कारण संभवत: इस शहर के अपने खास समीकरण रहे। उत्तर भारत का ऐतिहासक शहर, देश के सबसे बड़े प्रदेश की राजधानी और ब्राह्मण, वैश्य व कायस्थ बहुल इस विशिष्ट शहर से ज्यादा उचित स्थान दूसरा कोई हो नहीं सकता था।
शायद यही वजह रही कि यह शहर न सिर्फ अटल बल्कि स्व. भाऊराव देवरस और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की भी कर्मस्थली बना।
संभवत: इसी वजह से 1950 के दशक में लखनऊ सीट पर हुए उपचुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी को मैदान में उतारा गया। हालांकि शहर से भरपूर वोट पाने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्र में वोट न मिलने के कारण वे हार गए।
इसके बाद भी वाजपेयी यहां से कई बार चुनाव लड़े, पर 1991 में उनके चुनाव जीतने के साथ ही इसे भाजपा की सीट माना जाने लगा। प्रधानमंत्री बनने के बाद तो इस सीट का रुतबा और बढ़ गया।
अटल की बीमारी के साथ शुरू हुआ खेल
यह तथ्य किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि अटल के साथ नाम जुड़ना भाजपा में अपनी ब्रांडिंग व सम्मान का एक सहज तरीका माना जाने लगा है। इसीलिए 2004 के बाद अटल की बीमारी के साथ उनका उत्तराधिकारी बनने का वर्चस्व भी शुरू हो गया।
संकटों को दूर करने में माहिर माने जाने वाले राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश में अटल की विरासत के दावेदारों को पूरे संयम के साथ धीरे-धीरे करके राह से दूर करने में जुट गए।
उन्होंने ऐसी चालें चलीं कि लोग उसमें खुशी-खुशी उलझते गए। जब तक समझे तब तक पूरा मामला हाथ से निकल गया। बात लोकसभा चुनाव 2009 की है।
अटल की जगह लालजी टंडन, कलराज मिश्र या राजनाथ की चर्चा ही चल रही थी कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते राजाजीपुरम में एक सभा में राजनाथ सिंह ने घोषणा की कि उन्होंने अटल से लखनऊ संसदीय सीट से लालजी टंडन को लड़ाने की अनुमति ले ली है।
टंडन खुश हुए, उन्हें लगा कि लखनऊ में अटल के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में भाजपा ने उन्हें स्वीकार कर लिया है।
चल दिया नया दांव
पर, राजनाथ का निशाना तो कहीं और था। वे जानते थे कि लखनऊ में उनका महत्व तभी बढ़ेगा जब इस शहर में भाजपा खेमों में बंट जाएगी। टंडन की खुशी बहुत दिन बरकरार नहीं रह पाई।
वाजपेयी के उत्तराधिकारी के रूप में टंडन का नाम आगे करने वाले राजनाथ ने उनके (लालजी टंडन ) त्यागपत्र से खाली हुई विधानसभा सीट से अमित पुरी को उम्मीदवार घोषित कर झटका दे दिया।
टंडन को यह बुरा लगा कि उनके पुत्र गोपाल टंडन की जगह अनित को मैदान में उतारा गया। राजनाथ की इच्छा पूरी हुई। लखनऊ में गुटबाजी तूल पकड़ गई। गुस्से में टंडन सार्वजनिक रूप से वह भी बोल गए जिससे स्थानीय कार्यकर्ताओं का एक बड़ा खेमा नाराज हो गया। अमित पुरी दो हजार वोटों से चुनाव हारे तो इसका ठीकरा टंडन के सिर फूटा। कहा गया कि टंडन के विरोध के कारण भाजपा चुनाव हारी।
यह भी चर्चा फैली कि टंडन ने अमित पुरी को हराने के लिए ब्राह्मणों के बीच श्यामकिशोर शुक्ल को जिताने का आह्वान किया था। जो भी हो राजधानी की भाजपा कुछ नए खेमों में बंट गई।
पर, असली खेल तो यह हुआ
असली खेल 2012 में खेला गया। विधानसभा चुनाव में अमित पुरी का टिकट काटकर लालजी टंडन के पुत्र गोपाल टंडन को दे दिया गया।
यह जानते हुए कि कई बार से चुने जा रहे भाजपा विधायकों को लेकर आम लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं में भी काफी आक्रोश है, लोग बदलाव चाहते हैं, सभी पुराने विधायक उतार दिए गए।
जाहिर है कि गुटबाजी में फंसी भाजपा को सीटें हारनी ही थीं। भाजपा को सिर्फ एक सीट कलराज मिश्र के रूप में मिली।
यूपी के भाजपा प्रत्याशियों पर मंथन आज से
भारतीय जनता पार्टी लोकसभा चुनाव के लिए यूपी के प्रत्याशियों पर मंगलवार से मंथन करेगी। इसके लिए सभी प्रमुख नेता दिल्ली के लिए रवाना हो गए।
मोदी की लखनऊ रैली से निपटने के बाद भाजपा का पूरा फोकस प्रत्याशी चयन पर हो गया है। विभिन्न सीटों से टिकट के दावेदारों के बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा ने अलग-आलग चैनलों से फीडबैक जुटाया है।
दिल्ली में 4 मार्च को होने वाली बैठक में इन पर सभी नेताओं की राय लेकर प्रत्याशियों पर अंतिम फैसला होगा। भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक आठ मार्च को प्रस्तावित है।
इसमें कुछ सीटों से प्रत्याशी घोषित हो सकते हैं। संसदीय बोर्ड की बैठक 13 मार्च को भी प्रस्तावित है। इसमें भी यूपी पर चर्चा होनी है।