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रेलवे ने कोरोना की आड़ में बेडरोल की सुविधा को कर दिया ‘गोल’

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लखनऊ मंडल ने कोरोना की आड़ में बेडरोल की सुविधा को ‘गोल’ कर सालाना 1.10 करोड़ रुपये तो बचा लिए, लेकिन इसका बोझ आम जनता की जेब पर डाल दिया।
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लखनऊ मंडल प्रशासन अब डिस्पोजेबल बेडरोल की सुविधा दे रहा है। इसके लिए यात्रियों को ढाई सौ रुपये तक खर्च करने पड़ेंगे, जबकि इससे पहले तक टिकट के साथ लिनेन की सुविधा मुफ्त थी।
लखनऊ मंडल प्रशासन को अभी भी कोविड का डर सता रहा है, बेडरोल देने को तैयार नहीं है। बल्कि इसकी जगह डिस्पोजेबल बेडरोल की बिक्री शुरू कर दी गई है।
उत्तर व पूर्वोत्तर रेलवे लखनऊ मंडल के आला अधिकारियों से जब इस बाबत बात की गई तो वे बोर्ड से आदेश मिलने की बात कह रहे हैं। जबकि बोर्ड के अधिकारी इस ओर सोच तक नहीं रहे हैं।
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मालूम हो कि रात की ट्रेन व लंबी दूरी की ट्रेनों में रेलवे बेडरोल देता था। इसमें बेडशीट, टावल, तकिया व कंबल होता था। पर, कोरोना के बाद रेलवे ने संक्रमण की आशंका पर बेडरोल बंद कर दिए थे।
बोर्ड के सूत्रों की मानें तो अब यात्रियों को ही डिस्पोजेबल बेडरोल खरीदने पड़ेंगे। लखनऊ में इसकी शुरूआत जंक्शन रेलवे स्टेशन से हो चुकी है। यहां एक निजी संस्था के साथ मिलकर रेलवे ने जनाहार के पास बेडरोल की सुविधा शुरू की है।
यह है ‘डिस्पोजेबल बेडरोल’ की कीमत
- 50 रुपये में एक बेडशीट, फेस मास्क, ग्लव्स व सैनिटाइजर का पाउच मिलेगा।
- 100 रुपये में दो बेडशीट तकिया कवर, फेस मास्क, ग्लव्स, हेडकैप, सैनिटाइजर
- 200 रुपये में इनकेसाथ एक कंबल भी दिया जाएगा
- 250 रुपये में कंबल व इन वस्तुओं के अलावा फेसशील्ड भी दी जाएगी।
बेडरोल की होगी ‘नीलामी’!
रेलवे बोर्ड से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि बेडरोल की सुविधा कोविड पूरी तरह खत्म होने के बाद ही शुरू की जा सकती है। हालांकि, यह कब होगा, कोई नहीं जानता। पर, बोर्ड से जुड़े सूत्र बताते हैं कि रेलवे अन्य सुविधाओं की तरह धीरे-धीरे बेडरोल को गायब कर रहा है। इसके बाद लाखों कंबलों, बेडशीट की नीलामी भी कर दी जाएगी।
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96 लाख हर साल धुलाई पर होते थे खर्च
उत्तर व पूर्वोत्तर रेलवे की तीन मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री हैं, जो लखनऊ जंक्शन की ओर बनी हैं। एक लॉन्ड्री बंद हो गई है, जबकि नई लॉन्ड्री नब्बे लाख में बनाई गई है। लॉन्ड्री में उत्तर रेलवे की सात और पूर्वोत्तर की चार से पांच गाड़ियों में बेडरोल सप्लाई किया जाता था। इनकी धुलाई, साफ-सफाई पर रेलवे हर साल 96 लाख रुपये खर्च करती थी। जबकि चौदह से पंद्रह लाख तक के बेडरोल हर साल चोरी भी हो जाते थे।
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