गेस्टेल्ट थैरेपी व्यक्ति को उसके मानसिक अवरोधों जैसे असंतोष और क्षोभ
आदि से बाहर निकाल कर जीवन को उपयोगी ढंग से जीना सिखाती है।
इससे गुजरते
हुए व्यक्ति में अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु आत्मविश्वास तो आता ही है,
साथ ही वह जीवन में नए प्रयोगों के जरिए नए आयाम भी गढ़ना सीख जाता है। ये
कहना है जेएसएच मेडिकल कॉलेज, हॉस्पिटल मैसूर के डिपार्टमेंट ऑफ साइकैटरी
के प्रवक्ता डॉ. एलएसएस मैनिकैम का।
वे बृहस्पतिवार को राजधानी के एमिटी
विश्वविद्यालय में शुरू हुई गेस्टेल्ट थैरेपी पर राष्ट्रीय कार्यशाला को
संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर गेस्टेल्ट थैरेपी और उससे मानव जीवन पर
पड़ने वाले प्रभाव पर अहम चर्चाएं की गईं।
एआईबीएएस की निदेशिका प्रो. मंजू
अग्रवाल ने बताया कि गेस्टेल्ट थैरेपी, साइकोथेरेपी का ही एक विशेष
प्रायोगिक रूप है जिसे फ्रिस्टज पर्ल्स, लारा पर्ल्स और पॉल गुडमैन द्वारा
1940 से 1950 के बीच विकसित किया गया।
चार दिनों तक चलने वली कार्यशाला में
एमिटी विवि की डॉ. मानिनी श्रीवास्तव, प्रो-वीसी सेवानिवृत्त मेजर जनरल
केके ओहरी के साथ बड़ी संख्या देशभर से आए विशेषज्ञों ने शिरकत की।