यह दीगर बात है कि भगवा आंदोलनों से उनका कोई वास्ता नहीं रहा है लेकिन खुद को भगवा तेवर वाला नेता ही मानते हैं।
बाकी के नेताओं में उन्हें कोई तत्व दिखता नहीं। बेचारे! इस समय रात-दिन उस घड़ी को कोस रहे हैं जब भाजपा के अच्छे दिनों की शुरुआत हुई थी, जिसने उनके बुरे दिन शुरू कर दिए।
एक साथी को प्रतिनिधि बनाया तो उसे हटाना पड़ा। सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री पद का अभियान चलाया तो पार्टी में मिला पद भी चला गया जिसे छह साल की बालहठ के बाद हासिल किया था।
बेचारे ने मैसेज चलवाया कि उत्तर प्रदेश में युवा नेतृत्व के उभार के लिए पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय टीम से हटाया है, पर बुरा हो विरोधियों का जो इसकी भी हवा निकाल रहे हैं।
कहते घूम रहे हैं कि नेताजी के पास इसे प्रचारित कराने के अलावा और बचा ही क्या है। यूपी में युवाओं को जोड़ने के लिए राष्ट्रीय पदाधिकारी का पद बाधा तो बन नहीं रहा था।
फिर जनाब जो काम पद पर रहते न कर पाए, वह अब क्या करेंगे...।