नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 (आरटीई) के तहत राजधानी में 30 बच्चे अब भी दाखिले का इंतजार कर रहे हैं। इनके दाखिलों पर जिला अधिकारी ने मुहर लगा दी है लेकिन, स्कूलों की आनाकानी से मामला लटका हुआ है।
गुरुवार को हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सीएमएस द्वारा गरीब तबके के बच्चों को नि:शुल्क दाखिला देने से मना करने के तर्क को खारिज कर दिया और 13 बच्चों को नि:शुल्क दाखिला देने का निर्देश दिया। इसके बावजूद कई स्कूल गरीब बच्चों को मुफ्त में नहीं पढ़ाना चाहते हैं।
आरटीई पर काम कर रहीं भारत अभ्युदय फाउंडेशन की समीना बानो के अनुसार नि:शुल्क दाखिले के लिए लखनऊ में 25 हजार सीट हैं। इसके बावजूद पांच साल बाद आरटीई के तहत नि:शुल्क दाखिले की संख्या पांच सौ भी नहीं हो पाई है।
वर्ष 2010 में अधिनियम लागू होने के पांच साल बाद इस साल पहली बार सरकारी स्तर पर आरटीई के तहत नि:शुल्क दाखिलों को लेकर थोड़ी कोशिश हुई। इस साल करीब सात सौ आवेदन आए।
इनमें से 472 आवेदनों को जिला अधिकारी ने दाखिले की अनुमति दी। निजी स्कूलों की ना-नुकुर के बाद इनमें से 429 बच्चों को दाखिला मिल गया। डीएम की अनुमति के बावजूद 43 बच्चों के एडमिशन पर सीएमएस, डीपीएस, एसकेडी, एलपीसी, नवयुग रेडियंस, बेबी मार्टिन, एग्जान मांटेसरी, कॅरिअर कॉवेंट जैसे स्कूल तैयार नहीं थे।
सीएमएस तो एडमिशन के मुद्दे पर हाईकोर्ट तक चल गया। इसके बाद बाकी स्कूल तो मान गए पर नवयुग रेडियंस और बेबी मार्टिन स्कूल अब भी दाखिले में आनाकानी कर रहे हैं।