सूबे में 2016-17 से गांवों को 16 घंटे और शहरों को 24 घंटे बिजली देना संभव नहीं है। बिजली इंजीनियरों का कहना है कि निजी क्षेत्र के भरोसे 24 घंटे बिजली नहीं दी जा सकती है। प्रदेश अंधेरे की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने ऊर्जा नीति में बदलाव की मांग करते हुए कि वर्तमान ऊर्जा नीति के चलते 2016-17 में प्रदेश को 24 घंटे बिजली देना तो दूर, मांग और आपूर्ति का अंतर 3,000 मेगावाट से बढ़कर 8,000 मेगावाट तक पहुंच जाएगा। ऐसे में ज्यादा बिजली देना किसी भी हाल में संभव नहीं हो पाएगा।
ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे व राज्य विद्युत परिषद अभियंता संघ के महासचिव डीसी दीक्षित ने बुधवार को यहां बताया कि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के सर्वेक्षण के अनुसार 2016-17 में यूपी में बिजली की मांग 23,081 मेगावाट होगी जो अभी लगभग 13,000 मेगावाट है।
यानी अगले तीन साल में बिजली की मांग में 10,000 मेगावाट की वृद्धि होगी। दोनों पदाधिकारियों ने कहा कि बीते नौ वर्षो में निजी घरानों को एमओयू के जरिये 14,080 मेगावाट और बिडिंग के जरिये 3300 मेगावाट की नई परियोजनायें दी गई। किंतु ललितपुर और बारा के अलावा किसी पर काम शुरू नहीं हुआ।
अगर इनकी आधी क्षमता की परियोजनाएं सरकारी क्षेत्र में दी गई होती तो आज प्रदेश में बिजली का कोई संकट न होता और राज्य के पास सरप्लस बिजली होता। दोनों पदाधिकारियों ने कहा कि अभी भी समय है कि निजी घरानों के एमओयू निरस्त कर नई बिजली परियोजनाएं उत्पादन निगम को सौंपी जाएं।
दुर्गापूजा व दशहरे पर भी बिजली संकट
प्रदेश में चल रहे बिजली संकट का साया दुर्गापूजा व दशहरे पर भी पड़ने के आसार हैं। बिजली की किल्लत त्यौहारों की रंगत फीकी कर सकती है। इसी सप्ताह से शुरू हो रहे फेस्टिवल सीजन के लिए अतिरिक्त बिजली का इंतजाम करने में पावर कॉर्पोरेशन के अधिकारियों के पसीने छूट रहे हैं।
चूंकि पूरे उत्तरी ग्रिड में बिजली की कमी है इसलिए कहीं से अतिरिक्त बिजली की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। थोड़ी राहत की बात यह है कि 1 अक्तूबर से पावर ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन (पीटीसी) के माध्यम से यूपी को बैकिंग की 300 मेगावाट बिजली मिलने की उम्मीद है लेकिन इससे आपूर्ति में बहुत ज्यादा सुधार की गुंजाइश नहीं है।
कॉर्पोरेशन के आला अधिकारी हाथ-पांव तो काफी मार रहे हैं लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही है। ले-देकर अब एनर्जी एक्सचेंज का ही सहारा रह गया है।
प्रदेश में बिजली की मांग 13,000 मेगावाट से ऊपर चल रही है जबकि उपलब्धता 9,000 मेगावाट के आसपास ही है।
28 सितंबर से 3 अक्टूबर तक बढ़ेगी मांग
केंद्रीय सेक्टर के बिजलीघरों की कई इकाइयों के बंद होने से जहां यूपी को तय कोटे की 2000 मेगावाट से ज्यादा बिजली नहीं मिल पा रही है वहीं राज्य के बिजलीघरों की भी 1200 मेगावाट से ज्यादा क्षमता की इकाइयां कोयले की कमी या तकनीकी कारणों से बंद हैं। हालांकि बंद इकाइयों को चालू कराने की कोशिशें की जा रही हैं लेकिन दुर्गापूजा-दशहरा तक इनके चल पाने के आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं।
फेस्टिवल सीजन में आपूर्ति व्यवस्था दुरुस्त रखने के लिए पावर कॉर्पोरेशन के चेयरमैन संजय अग्रवाल व प्रबंध निदेशक एपी मिश्र ने बुधवार को शक्ति भवन में नियंत्रण कक्ष, ट्रांसमिशन और वितरण के आला अधिकारियों के साथ बैठक भी की।
त्यौहारों पर लोगों को ज्यादा से ज्यादा बिजली उपलब्ध कराने के लिए एनर्जी एक्सचेंज से ज्यादा कीमत की बिजली खरीदने का विकल्प भी खुला रखते हुए अधिकारियों को अधिकतम मात्रा में बिजली खरीदने की बिड करने को कहा गया है।
अभियंताओं का कहना है कि अगर कुछ बंद इकाइयां चल जाती हैं तो भी बिजली की कमी रहेगी क्योंकि 28 सितंबर से 3 अक्तूबर के बीच बिजली की मांग में कम से कम 500-700 मेगावाट की बढ़ोतरी का अनुमान है।
गांवों को मिल रही नाममात्र बिजली
बिजली की जबरदस्त किल्लत के चलते आपूर्ति शिड्यूल पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। गांवों को महज तीन घंटे ही बिजली मिल पा रही है जबकि शहरी इलाकों में भी 8 से 12 घंटे कटौती हो रही है।
बुधवार को केंद्र से यूपी का कोटा 5005 मेगावाट था जबकि केवल 3057 मेगावाट बिजली ही मिल पाई है। राज्य के बिजलीघरों का उत्पादन भी घटकर 2100 मेगावाट रह गया है।
बिजली किल्लत पर पावर कार्पोरेशन के प्रबंध निदेकश कहते हैं 'बिजलीघरों के उत्पादन में कमी तथा केंद्र से कोटे की पूरी बिजली न मिलने की वजह से दिक्कत है लेकिन त्यौहारों पर आपूर्ति व्यवस्था सामान्य रखने के लिए सभी संभव स्रोतों से बिजली का इंतजाम करने की कोशिश की जा रही है। एनर्जी एक्सचेंज से ज्यादा से ज्यादा बिजली खरीदने का फैसला किया गया है ताकि लोगों को कम से कम दिक्कत हो।'