केंद्र पानी देने को तैयार, पर प्रदेश सरकार का पानी लेने से इन्कार। बात यहीं तक नहीं। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि देना ही है तो पानी की ट्रेन के बजाय 10 हजार टैंकर दो।
विज्ञापन
केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती का तर्क है कि पानी की ट्रेन बुंदेलखंड के सांसदों की मांग पर भेजी गई है। इसलिए मुख्यमंत्री को इन्कार करने के बजाय बुंदेलखंड की जनता की पेयजल समस्या समाधान के लिए पानी ले लेना चाहिए।
अतीत पर नजर डालें तो जन सरोकारों से जुड़े किसी मुद्दे पर केंद्र और राज्य के बीच रार पहली बार नहीं हो रही है। पहले भी कई बार इस तरह की स्थिति सामने आ चुकी है। ज्यादा पीछे न जाएं तो पिछले दो साल के दौरान ही राहत पर सियासत के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं।
विज्ञापन
राजनीतिक समीक्षकों के मुताबिक, इसमें न तो कुछ नया है और न आश्चर्य करने वाला। सामने जब वोट का सवाल खड़ा हो तो इस तरह की स्थिति स्वाभाविक ही है। सभी राजनीतिक दलों के सामने 2017 का विधानसभा चुनाव है। इसलिए राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, दोनों की तरफ से कोशिश हो रही है कि जनता के संकट में सहायक की भूमिका में पहले वही खड़ी दिखे।
'मुद्दा सहायता का नहीं, बल्कि वोट का है'
मुद्दा सहायता का नहीं, बल्कि वोट का है। वे याद दिलाते हैं कि राहत पर सियासत तो उस दौर में भी नहीं रुकी जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और उत्तर प्रदेश में सपा या बसपा जैसी पार्टियों की सरकारें जो दिल्ली में कांग्रेस की सरकार का समर्थन कर रही थीं।
2012 के विधानसभा चुनाव से पहले सूबे की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने बुंदेलखंड के लिए 80 हजार करोड़ रुपये के पैकेज पर किस तरह केंद्र सरकार को घेरा था। मनरेगा पर किस तरह दोनों सरकारों के बीच तनातनी चली थी। बसपा के बाद सपा की सरकार बनी तो भी केंद्र और राज्य के बीच तनातनी नहीं थमी।
एंबुलेंस पर सियासत
अखिलेश सरकार ने आते ही मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए समाजवादी एंबुलेंस योजना शुरू की। केंद्र में तत्कालीन यूपीए सरकार ने एंबुलेंस का नाम समाजवादी रखने पर आपत्ति उठा दी।
केंद्र का तर्क था कि धन केंद्र का है, इसलिए एंबुलेंस पर समाजवादी शब्द नहीं होना चाहिए। प्रदेश सरकार नहीं मानी। दिल्ली में सपा से समर्थन मिलने के बावजूद केंद्र सरकार ने एंबुलेंस संचालन के लिए दिए जाने वाले धन को रोक दिया। प्रदेश सरकार ने एलान किया कि वह अपने धन और संसाधनों से एंबुलेंस चलाएगी।
राज्य ने मांगे 7543 तो केंद्र ने दिए 2801 करोड़
- फोटो : amar ujala
केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद भी राहत पर रार जारी रही। वर्ष 2015 की शुरुआत में प्रदेश के 73 जिलों में अतिवृष्टि व ओलावृष्टि का संकट किसानों पर टूट पड़ा। प्रदेश सरकार ने केंद्र से 7543 करोड़ रुपये मांगे। केंद्र सरकार ने किसानों 2801 करोड़ रुपये दिए।
प्रदेश ने आपत्ति उठाते हुए कहा कि यह बहुत कम है तो केंद्र की तरफ से तर्क दिया गया कि किसानों की मदद की मद का पूरा धन दे दिया गया है। सिर्फ विभिन्न परियोजाओं के निर्माण के लिए मांगी गई रकम नहीं दी गई। वह भी इसलिए क्योंकि यह गाइडलाइन के विरुद्ध है। खूब रार हुई। प्रदेश सरकार ने कहा कि केंद्र किसानों की मदद नहीं करना चाहता।
केंद्र बोला, परियोजनाओं के लिए पैसा चाहिए तो दूसरा प्रस्ताव भेजें। राज्य सरकार ने केंद्र के बराबर खुद भी राहत देने का एलान किया। राष्ट्रीय आपदा मोचक निधि से 478.70 करोड़ रुपये घोषित किए तो केंद्र की तरफ से कहा गया कि इसमें तो 75 प्रतिशत धन केंद्र का ही है। समय के साथ सहायता के जुमले भी ठंडे पड़ गए।
केंद्र के बराबर मदद देने का एलान राज्य सरकार की फाइलों में दब गया। प्रदेश सरकार सिर्फ 1218 करोड़ रुपये ही दे सकी।
केंद्र ने खत्म कर दिया बुंदेलखंड पैकेज
- फोटो : PTI
मौजूदा केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज खत्म कर दिया। इस पर प्रदेश सरकार ने आपत्ति की। केंद्र पर बुंदेलखंड की अनदेखी का आरोप लगाया। कहा कि पैकेज बंद होने से उसकी कई योजनाएं रुक गई हैं। इसलिए केंद्र सरकार धन दे।
केंद्र ने कहा कि पैकेज नहीं मिलेगा। योजनाओं का ब्योरा भेजें, उसके अनुसार धन मिलेगा। इसको लेकर भी दोनों सरकारों के बीच लंबी रार चली। अब भी जब-तब यह मुद्दा तकरार की वजह बन जाता है।
समाजवादी राहत पैकेट
बुंदेलखंड के लोगों को बांटा जा रहा समाजवादी राहत पैकेट भी सियासत का मोहरा बन चुका है। यह राहत पैकेट राज्य आपदा राहत निधि की मदद से दिया जा रहा है।
केंद्र सरकार की तरफ से इसका नाम समाजवादी रखने पर आपत्ति की जा चुकी है। तर्क है कि जिस निधि से यह योजना चलाई जा रही है, उसमें 75 प्रतिशत धन तो केंद्र का ही है। इस पर भी खूब आरोप-प्रत्यारोप हुए।
पिछले दिनों प्रदेश सरकार ने केंद्र पर आपदा राहत कार्यों के लिए धन न देने का आरोप लगाया। केंद्र की तरफ से बताया गया कि यूपीए सरकार के दौरान 2010 से 2014 के बीच राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार से 1 लाख करोड़ रुपये मांगे थे।
इसमें 13,762 करोड़ रुपये ही दिए गए थे, पर मौजूदा केंद्र सरकार ने 2014-15 और 2015-16 में 4200 करोड़ रुपये की मदद दी है। यही नहीं, केंद्र ने यह भी कहा कि प्रदेश सरकार समय से रिपोर्ट ही नहीं भेजती जिससे धन देने में दिक्कत आती है।
वोट के अलावा और कुछ नहीं
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. कौशल किशोर मिश्र का भी कहना है कि वोट की राजनीति के बढ़ते प्रभाव के कारण राहत भी राजनीति का मुद्दा बन गई है।
दरअसल, राहत एक ऐसा मुद्दा है जो लोगों के दिल और दिमाग को छूता है। राजनीतिक दलों को लगता है कि मुसीबत में मददगार के रूप में अगर वे खड़े दिखाई देंगे तो इसका लाभ चुनाव में मिलेगा।
इसीलिए हर राजनीतिक दल की कोशिश होती है कि कोई दूसरा मददगार के रूप में न दिखने पाए। जम्मू-कश्मीर, बिहार, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी इस तरह की रार सामने आ चुकी है, पर राजनीतिक दलों को समझ लेना चाहिए कि इस तरह की कोशिशें स्थायी सफलता नहीं दिलातीं।