बसपा सुप्रीमो मायावती ने जिन्ना विवाद के पीछे सपा-भाजपा की मिलीभगत बताया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि सपा मुखिया द्वारा हरदोई में जिन्ना को लेकर दिया गया बयान और उसे लपककर भाजपा की प्रतिक्रिया इनकी अंदरूनी मिलीभगत व इनकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। ताकि विधानसभा चुनाव में माहौल को हिंदू-मुस्लिम करके खराब किया जाए। सपा व भाजपा की राजनीति एक दूसरी की पूरक एवं पोषक रही है। दोनों की सोच जातिवादी तथा सांप्रदायिक होने के कारण इनका अस्तित्व एक दूसरे पर आश्रित रहा है। इसी कारण सपा जब सत्ता में होती है तो भाजपा मजबूत होती है, जबकि बीएसपी जब सत्ता में रहती है तो भाजपा कमजोर होती है।
असल मुद्दों से ध्यान बंटाने को खड़ा किया विवाद : कांग्रेस
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता अशोक सिंह का कहना है कि सपा और बसपा, भाजपा की बी टीम हैं। इसलिए महंगाई, गरीबी, किसानों के दुख-दर्द और पेट्रोल-डीजल के आसमान छूते रेट पर चर्चा के बजाय जिन्ना जैसे मुद्दों को हवा दे रहे हैं। ये सभी पार्टियां कांग्रेस को मिल रहे जनसमर्थन से घबराई हुई हैं, इसलिए जनता का ध्यान इस तरह के मुद्दों पर केंद्रित करने का षड्यंत्र कर रहे हैं। अब जनता इनके बहकावे में आने वाली नहीं है।
अनर्गल बात करती है भाजपा : सपा
सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. आशुतोष वर्मा ने कहा कि भाजपा हमेशा अनर्गल बात करती है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और पार्टी से जुड़ा हर व्यक्ति देश की आजादी में योगदान देने वाले हर महापुरुष का सम्मान करते हैं। भाजपा को आत्मवलोकन करना चाहिए। भाजपा पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की हमेशा से विरोधी रही है। पिछड़ा होने की वजह से उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद की कुर्सी पहले ही खींची जा चुकी है। चुनाव में स्टूल भी चला जाएगा। ऐसे में उन्हें अनर्गल बात करने के बजाय सर्वसमाज की बात करने वाली समाजवादी पार्टी का समर्थन करना चाहिए। सपा उन्हें पूरा सम्मान देगी।
अखिलेश ने दिया था यह बयान
अखिलेश यादव ने रविवार को हरदोई में सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा का अनावरण करते हुए कहा था कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू और जिन्ना एक ही संस्था से पढ़कर निकले। बैरिस्टर बने और उन्होंने आजादी दिलाई। आजादी के लिए हर तरह का संघर्ष किया। भाजपा के लोग वाकई पटेल जी को मानते हैं तो तीनों कृषि कानून रद करें।
जिन्ना ने कहा था- एक दूसरे से अलग हैं हिंदू-मुसलमान
‘हिंदुओं और मुसलमानों की परंपराएं, रीति-रिवाज और विचारधारा जुदा हैं। न वे एक साथ खाते हैं न एक-दूसरे के यहां शादी करते हैं। वास्तव में दोनों एक दूसरे की विपरीत विचारधारा और मान्यता वाली सभ्यताओं से ताल्लुक रखते हैं। दोनों के लिए अलग देश होना चाहिए।’
- मोहम्मद अली जिन्ना, 23 मार्च 1940 को (इसी अधिवेशन में पाकिस्तान की स्थापना का प्रस्ताव पारित हुआ था। इसे जिन्ना का द्विराष्ट्र सिद्धांत कहा गया।)