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अयोध्या: निर्माण व समाधान की आस लिए दुनिया से विदा हो गए कई किरदार तो कुछ पर बुढ़ापे की मार

Sun, 10 Nov 2019 04:19 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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पूर्व प्रधानमंत्री राजीव व अटल बिहारी व भाजपा संरक्षक लाल कृष्ण आडवाणी। - फोटो : amar ujala
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सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया और मस्जिद के लिए वैकल्पिक जगह भी मुहैया करा दिया। न कोई जीता और न कोई हारा। पर, यह फैसला जब आया तब तक मंदिर और मस्जिद बनाने का सपना लेकर न्यायालय पहुंचे तथा आंदोलन चलाने वाले एवं समाधान में भूमिका निभाने वाले मुख्य किरदारों में से ज्यादातर चेहरे दुनिया से विदा हो चुके हैं। कई किरदार बदल गए तो कुछ की भूमिकाएं। तब मंदिर बनाने की सरकार से मांग करने वाले आज स्वयं ‘सरकार’ हैं। कुछ जो तब इस आंदोलन में ही नहीं थे वे आज सत्ता संचालन के सूत्रधार हैं।

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अटल की भी रही भूमिका, वहीं रथी आडवाणी आज संरक्षक
उदारवादी चेहरा होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी ने इस मामले के समाधान का कई बार प्रयास किया। ढांचा गिरने के बाद जब राव सरकार ने संघ और विहिप पर प्रतिबंध लगा दिया, तब अटल ने संसद में इसका प्रतिवाद किया। ढांचा गिरने से एक दिन पहले उन्होंने लखनऊ में जो भाषण दिया था वह भी काफी चर्चा में  रहा था।

अयोध्या रथयात्रा से बनाया माहौल
अयोध्या में 1990 में कारसेवा के लिए लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा ने भी काफी माहौल बनाया था। तब रथी रहे आडवाणी को जेल में भी रहना पड़ा। उनके इतंजार में देर रात तक सड़कों पर लोगों की भीड़ रहती थी। आडवाणी के सारथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। आडवाणी आज संरक्षक की भूमिका में हैं। तब आडवाणी के सारथी मोदी आज फैसले के वक्त देश के प्रधानमंत्री हैं।
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जोशी भी कम महत्वपूर्ण नहीं
मंदिर आंदोलन के समय अटल-आडवाणी के बाद भाजपा के सबसे कद्दावर डॉ. मुरली मनोहर जोशी आज बूढ़े हो गए हैं। इस आंदोलन में डॉ. जोशी का किरदार कम महत्वपूर्ण नहीं रहा। जब ढांचा गिरा तो उस समय वह अयोध्या में संबंधित स्थल पर मौजूद थे।

राजीव गांधी की भूमिका भी चर्चा में रही

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी। - फोटो : amar ujala
प्रधानमंत्री रहे कांग्रेस के गुलजारी लाल नंदा व प्रदेश की कांग्रेस सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे दाऊदयाल खन्ना की पहल पर ही राम जन्मभूमि आंदोलन की रूपरेखा बनी थी। ये दोनों आज नहीं हैं। बावजूद इसके इस आंदोलन के उभार के बाद कांग्रेस को यूपी में नुकसान उठाना पड़ा। फैजाबाद के जिस वकील उमेश पांडेय की अर्जी पर जिला अदालत फैजाबाद ने ताला खोलने का फैसला दिया वह भी कांग्रेस के थे। जिस तरह ताला खुला व शिलान्यास हुआ उससे तत्कालीन केंद्र सरकार व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भूमिका भी चर्चा में आई थी।

भुलाए नहीं भूलते नरसिंहा राव
6 दिसंबर, 1992 को ढांचा ढहाया गया तो नरसिंहा राव देश के प्रधानमंत्री थे। माना जाता है कि राव की सहानुभूति हिंदुत्व आंदोलन के साथ और मंदिर निर्माण के पक्ष में थी। वह भी आज नहीं हैं। राव ने ट्रस्ट बनवाकर इस विवाद के समाधान का रास्ता सुझाया था। ढांचा गिरने के बाद उन्हीं के प्रधानमंत्री रहते अयोध्या की भूमि अधिगृहीत की गई।

शहाबुद्दीन की भूमिका अहम
मुस्लिम पक्ष के एक पैरोकार सैयद शहाबुद्दीन भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी थे। वह बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता थे, जिनका निधन 2017 में हुआ।

अवेद्यनाथ व परमहंस की दहाड़ से फड़क पड़ती थीं भुजाएं

गोरखनाथ पीठ के महंत अवेद्यनाथ व दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस - फोटो : amar ujala
अयोध्या और मंदिर-मस्जिद की बात पर निगाहें मुख्य रूप से विहिप, शिवसेना से लेकर, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और सुन्नी वक्फ बोर्ड पर आ टिकती हैं। जिन्होंने श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत देखी उन्हें याद होगा कि किस तरह गोरखनाथ पीठ के महंत अवेद्यनाथ, अयोध्या के दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस की दहाड़ सभाओं में लोगों के हाथों को आसमान की तरफ से उठने पर मजबूर कर देती थी। इनमें से आज फैसला सुनने के लिए कोई नहीं है। रामचंद्र परमहंस अयोध्या आंदोलन के अगुवा थे और श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष। उनका 31 जुलाई, 2003 को निधन हो गया और श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष अवेद्यनाथ की 12 सितंबर, 2014 को मृत्यु हो गई।

अशोक सिंहल: मंदिर आंदोलन के डिजाइनर
मंदिर आंदोलन के डिजाइनर माने जाने वाले विहिप के तत्कालीन महामंत्री अशोक सिंहल अब दुनिया में नहीं हैं। उनके भाई वीपी सिंहल भी इस आंदोलन में सक्रिय रहे और वह भी अब नहीं रहे। प्रदेश के पुलिस महानिरीक्षक रहे श्रीश चंद्र दीक्षित ने भी इस आंदोलन को नए तेवर देने में कम भूमिका नहीं निभाई। वह भी अब इस दुनिया में नहीं हैं।

युवा से प्रौढ़ावस्था में कटियार
राममंदिर आंदोलन से युवाओं को जोड़ने के लिए संघ ने विहिप के अंतर्गत बजरंग दल बनाया तो संघ के प्रचारक विनय कटियार को उसका राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया। कानपुर के रहने वाले कटियार के तेवरों व भाषणों ने इस आंदोलन को आक्रामक बनाने में भूमिका निभाई। कटियार इस आंदोलन से जुड़े तो अयोध्या में ऐसा मन रमा कि वहीं के होकर रह गए। तीन बार यहां से सांसद रहे। फिलहाल इस समय संगठन में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं है।

विरोध में रहते हुए भी हमेशा रहे साथ

महंत परमहंस रामचंद्रदास और हाशिम अंसारी। - फोटो : amar ujala
अयोध्या विवाद में एक नाम कौंधता है वह है बाबरी मस्जिद के मुख्य पैरोकार हाशिम अंसारी। हाशिम चचा के नाम से मशहूर इस किरदार की मस्जिद के पक्ष में लड़ाई लड़ने के बावजूद दिगंबर अखाड़े के महंत परमहंस के साथ दोस्ती चर्चा में रही। हाशिम तो परमहंस के तांगे पर एक ही साथ इस विवाद की पैरोकारी के लिए जाते थे। हाशिम का भी 2019 में निधन हो गया।

उनकी जगह उनके पुत्र इकबाल अंसारी पैरोकारी कर रहे थे। मस्जिद के एक और पैरोकार फेंकू भी आज दुनिया में नहीं हैं। हाजी फेंकू मस्जिद पक्ष के मौजूदा पैरोकार हाजी महबूब के पिता थे।

भास्कर दास की भी नहीं पूरी हुई आस
आंदोलन में सक्रिय रहे निर्मोही अखाड़ा के महंत भास्कर दास 1959 में इस मामले में निर्मोही अखाड़ा की तरफ से राम जन्मभूमि स्थल पर अपने अखाड़े के एक महंत रघुनाथ दास की तरफ से किए गए दावे में शामिल थे। उन्होंने न्यायालय द्वारा इस स्थल पर नियुक्त रिसीवर को हटाने की मांग करते हुए अपने अखाड़े के कब्जे में देने की मांग की थी।

उम्र ने कमजोर कर दी कल्याण की आवाज

भाजपा नेता कल्याण सिंह। - फोटो : amar ujala
मंदिर आंदोलन में सक्रिय रहे कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते ढांचा गिरा, जिसके आरोप में इन पर आज भी सीबीआई की विशेष अदालत में मुकदमा चल रहा है। कल्याण एकमात्र ऐसे किरदार हैं जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में न्यायालय में दाखिल शपथपत्र का पालन करने के कारण अवमानना मामले में एक दिन की सजा सुनाई थी। कल्याण ने कहा था, ‘राम के लिए एक दिन क्या, जीवन भर जेल में रहने को तैयार हूं, एक सत्ता क्या, सैकड़ों सत्ता को ठोकर मार सकता हूं।’ कल्याण के तेवर तो वही रहे, लेकिन उम्र के कारण शरीर व आवाज कमजोर हो गई।

उमा भारती की भी बदल गई भूमिका
आंदोलन के दौरान कटियार की तरह ही तेवरों वाले भाषण उमा भारती भी देतीं थी। साध्वी उमा और साध्वी ऋतंभरा के भाषण गांव-गांव तक पहुंचे। 1991 के चुनाव में इनकी आॅडियो-वीडियो सीडी गांव-गांव में चलाई गई। उमा भी आज राजनीति से किनारे हैं।
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मुलायम के बिना बात अधूरी

मुलायम सिंह यादव - फोटो : amar ujala
इस आंदोलन में मुलायम सिंह यादव का जिक्र किए बिना बात अधूरी रहेगी। मंदिर आंदोलन के दौरान मुलायम के मुख्यमंत्री रहते भारी सख्ती हुई। अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चली। बावजूद इसके उन्होंने अपने दम पर प्रदेश में सपा के रूप में एक सियासी विकल्प दिया। पिछले दिनों मुलायम ने अयोध्या में गोली चलवाने पर अफसोस जताकर चर्चा भी पाई। मुलायम भी इस समय मुख्य धारा से बाहर हैं।

संघ प्रचारकों की भी रही बड़ी भूमिका
बाला साहब देवरस संघ के तब सरसंघचालक थे और उनके अनुज भाऊराव देवरस सह सरकार्यवाह। इनके साथ सह सरकार्यवाह प्रो. राजेन्द्र सिंह रज्जू भैया, वरिष्ठ पत्रकार व संघ प्रचारक भानुप्रताप शुक्ल की भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही।

भाजपा नेता व यूपी के राज्यपाल रहे विष्णुकांत शास्त्री, भाजपा के ब्रह्मदत्त द्विवेदी, विहिप के मोरोपंत पिंगले, ओंकार भावे, महेशनारायण सिंह भी कुछ ऐसे ही नाम हैं जो आज दुनिया में नहीं हैं। पक्षकार गोपाल सिंह विशारद, देवकी नंदन अग्रवाल व शिलान्यास के विरोध में ‘फावड़ा मेरे सिर पड़ेगा’ का एलान करने वाले कमलापति त्रिपाठी भी दुनिया में नहीं हैं।

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने भी श्रीराम पुनरुद्धार समिति बनाकर इस स्थान पर मंदिर बनाने   की लड़ाई लड़ी है।
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