सूबे के वजीर की भी अपनी जिद रहती है। वे एक बार जो ठान लेते उसे पूरा करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सभी तरीके अपनाते हैं।
उनका हौसला सूबे के मुखिया के कारण भी बढ़ रहा है। उनकी हर बात मान ली जाती है। अभी पिछले दिनों उन्होंने अपने विभाग के एक अधिकारी से ऐसा काम कहा जो कानूनन उचित नहीं था।
वे अपने विभाग के एक सरकारी शोध संस्थान को अपने निजी विश्वविद्यालय में विलय कराना चाहते थे, लेकिन अधिकारी ने वजीर को टका सा जवाब दे दिया। उन्होंने कहा कि यह काम तो हो ही नहीं सकता है।
इसके बावजूद वजीर लगातार अपना दबाव बनाते रहे। इस पर अधिकारी एक महीने की लंबी छुट्टी लेकर घर बैठ गए। उन्होंने कहा कि यह काम जिससे करवाना हो करवा लें वे नहीं कर सकते हैं।
अब तो उन अधिकारी ने अपना तबादला भी वजीर के विभाग से दूसरी जगह करवा लिया है। लेकिन मंत्री जी अपनी जिद पर अड़े हुए हैं।