ब्यूरोक्रेसी में आजकल एक जुमला खूब चल रहा है ‘चाचा से पंगा न लेना’। जब पूरी ‘सरकार’ ही ‘चाचा’ के इर्द-गिर्द घूमती हो तो कोई अफसर उनकी हुक्मउदुली करके कैसे बच सकता है।
सूबे के खजाने की देखभाल के लिए तैनात एक वरिष्ठ अधिकारी यह गलतफहमी पाले हुए थे कि वही ‘सरकार’ के सबसे चहेते हैं, जो कुछ कर रहे सब ठीक हैं।
इसी गलतफहमी में वह ‘चाचा’ से भी पंगा ले बैठे। जैसे बाकी मंत्रियों को ‘डील’ करते थे, वैसे ही ‘चाचा’ को भी करने की गलती कर बैठे।
कई मंत्री और विधायक पहले भी ‘सरकार’ से इस अफसर की शिकायत कर चुके थे लेकिन तब ‘सरकार’ ने कुछ नहीं किया। अफसर ने जब दूसरे मंत्रियों की तरह ‘चाचा’ को भी उनके ड्रीम प्रोजेक्ट के लिए टका का सा जवाब दे दिया तो उनसे सहा नहीं गया।
‘चाचा’ की नाराजगी को भांपते हुए ‘सरकार’ ने तत्काल अफसर से खजाने की देखभाल का काम वापस लेने का फरमान जारी कर दिया।
अब ‘चाचा’ रौब के साथ कहते हैं कि जो हमारी बात नहीं मानेगा उसका यही हश्र होगा। घर की ‘सरकार’ होने का यही तो फायदा है।